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Bihar Politics: बीजेपी मानेगी बात या नीतीश कुमार रह जाएंगे खाली हाथ? JDU ने अभी से कर दी बड़ी डिमांड

Bihar News In Hindi: बिहार में नई सरकार गठन पर NDA में चर्चा जारी है, JDU विधानसभा अध्यक्ष पद मांग रही है, जो अभी BJP के प्रेम कुमार के पास है. अध्यक्ष के पास निर्णय लेने की असाधारण शक्तियां होती हैं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन भरते ही बिहार में नई सरकार के गठन को लेकर भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में चर्चा शुरू हो गई है. बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड के बीच अभी नई सरकार को लेकर कोई स्थिति साफ नहीं हुई है. इसी बीच खबरें आ रही हैं कि JDU ने बिहार विधानसभा के अध्यक्ष पद की मांग कर दी है.

अभी यह पद BJP के नौ बार के विधायक प्रेम कुमार के पास है. सवाल उठता है कि ऐसी कौन सी शक्तियां है जो विधानसभा के अध्यक्ष की स्थिति को मजबूत करती है. और  क्यों गठबंधन के दोनों दल इस पद को अपनी पार्टी के लिए चाहते हैं. 

 कौन हैं प्रेम कुमार और कैसे बने विधानसभा अध्यक्ष?

प्रेम कुमार गया नगर विधानसभा क्षेत्र से नौ बार के विधायक हैं. 2015 के विधानसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने लंबे समय बाद एक बार फिर गठबंधन किया था तब JDU-RJD गठबंधन की जीत में BJP को हार का सामना करना पड़ा था और उस दौरान प्रेम कुमार बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे. 1 दिसंबर 2025 को हुए नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रेम कुमार सर्वसम्मति से बिहार विधानसभा के अध्यक्ष चुने गए. अब JDU चाहती है कि यह पद उनकी पार्टी के पास आ जाए.

 विधानसभा अध्यक्ष के पास होती हैं असाधारण शक्तियां

विधानसभा का अध्यक्ष केवल सभा की अध्यक्षता नहीं करता. कौन सदस्य कब बोलेगा, कितना बोलेगा, चर्चा में उसे कितना समय मिलेगा और कोई बिल सदन में पेश करने की अनुमति तक विधानसभा का अध्यक्ष देता है. अनुशासन बनाए रखने की शक्तियां भी उसके पास होती हैं. इसके अलावा विधानसभा में होने वाली किसी भी चर्चा पर अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष का होता है.

अगर कोई विधायक अपने पद से इस्तीफा देना चाहता है तो उसका अंतिम निर्णय भी विधानसभा अध्यक्ष के पास होता है. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल दल बदल के कानून पर भी अंतिम फैसला लेने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को है. कोई विधायक पार्टी लाइन बदलता है, व्हिप का उल्लंघन करता है या पार्टी के खिलाफ जाता है तो उसकी सदस्यता रहेगी या नहीं यह अंतिम रूप से विधानसभा अध्यक्ष तय करता है.

इसके अलावा कोई बिल मनी बिल है या नहीं इसका अंतिम निर्णय भी अनुच्छेद 199 के तहत विधानसभा अध्यक्ष के पास होता है. सामान्यतः विधानसभा अध्यक्ष वोट नहीं डालता लेकिन अगर किसी चर्चा पर दोनों पक्षों के वोट बराबर हों तो वह निर्णायक वोट डाल सकता है. सदन की कार्यवाही स्थगित करना और समितियों का निर्माण करना भी उसी के अधिकार में आता है.

 मध्यप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र- जब स्पीकर ने बदली सियासत की दिशा

इतिहास में कई बार विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों ने सियासी समीकरण बदले हैं. साल 2018 में कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई. मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के 22 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया जिससे सरकार अल्पमत में आ गई. BJP ने फ्लोर टेस्ट की मांग की लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने अपनी शक्तियों का उपयोग कर फ्लोर टेस्ट टाल दिया.

16 मार्च 2020 को बजट सत्र शुरू होते ही कोविड-19 का हवाला देकर सदन को 26 मार्च तक स्थगित कर दिया. इसके साथ ही बागी 22 विधायकों में से सभी के इस्तीफे एक साथ स्वीकार नहीं किए ताकि बाकी विधायकों पर दबाव बनाया जा सके. बाद में शिवराज सिंह चौहान ने सुप्रीम कोर्ट में फ्लोर टेस्ट की मांग की और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर विशेष सत्र बुलाया गया लेकिन उससे पहले ही कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया.

साल 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस-JDS गठबंधन की एचडी कुमारस्वामी सरकार के दौरान कई विधायकों ने इस्तीफा दिया लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष के.आर रमेश कुमार ने इस्तीफे तुरंत स्वीकार नहीं किए. उन्होंने विधायकों को व्यक्तिगत रूप से आकर पुष्टि करने को कहा जिससे प्रक्रिया लंबी खिंची. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अंततः कुमारस्वामी सरकार गिर गई.

इसी तरह साल 2022 में महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से बगावत की. बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और फ्लोर टेस्ट से पहले ही उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा दे दिया.

 इसीलिए JDU को चाहिए स्पीकर का पद?

इन उदाहरणों से साफ है कि विधानसभा अध्यक्ष इस्तीफे स्वीकार करने में देरी कर सकता है, विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकता है, फ्लोर टेस्ट टाल सकता है और सदन को स्थगित कर सकता है. यही कारण है कि नीतीश कुमार की पार्टी JDU यह पद किसी भी कीमत पर अपने पास रखना चाहती है जो अभी BJP के प्रेम कुमार के पास है. इसको लेकर अब बिहार की राजनीति में नई कश्मकश शुरू हो गई है.

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