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कम पानी में होगी दोगुनी पैदावार, कैसे 'प्रति बूंद अधिक फसल' योजना बदल रही किसानों की किस्मत?

Per Drop more Crop Scheme: पानी की कमी वाले इलाकों के लिए प्रति बूंद अधिक फसल योजना नया बदलाव लेकर आई है. मॉडर्न सिंचाई तकनीकों के जरिए से किसान अबअपनी फसलों से रिकॉर्डतोड़ उत्पादन हासिल कर रहे हैं.

Per Drop more Crop Scheme: देश के कई इलाकों में पानी की कमी खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है. ऐसे में किसान कम पानी में ज्यादा उत्पादन देने वाली तकनीकों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं. इसी सोच के साथ सरकार ने प्रति बूंद अधिक फसल योजना को बढ़ावा दिया है. जिसके तहत किसानों को आधुनिक सिंचाई सिस्टम अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

खासकर स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकें उन इलाकों में काफी कारगर साबित हो रही हैं जहां पानी कम मात्रा में उपलब्ध है. इन तकनीकों की मदद से न सिर्फ पानी की बचत हो रही है बल्कि फसलों की क्वालिटी और प्रोडक्शन में भी सुधार देखने को मिल रहा है. यही वजह है कि कई किसान अब पारंपरिक सिंचाई छोड़कर आधुनिक सिस्टम की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं.

स्प्रिंकलर सिंचाई से बचता है पानी 

स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली आज पानी की कमी वाले इलाकों में किसानों के लिए बड़ा सहारा बन रही है. इस तकनीक में पाइप और नोजल के जरिए खेत में बारिश जैसी सिंचाई की जाती है. जिससे पानी पूरे खेत में बराबर पहुंचता है. पारंपरिक तरीके में जहां काफी पानी बहकर बर्बाद हो जाता है. वहीं स्प्रिंकलर सिस्टम पानी की खपत को काफी हद तक कम कर देता है.

इसका फायदा यह होता है कि मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और पौधों को जरूरत के मुताबिक पानी मिलता है. कई फसलों में इससे प्रोडक्शन बढ़ने के साथ-साथ लागत भी कम होती है. यही वजह है कि कम पानी वाले इलाकों में इस तकनीक को तेजी से अपनाया जा रहा है. 

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90 फीसदी तक सब्सिडी

आधुनिक सिंचाई सिस्टम की शुरुआती लागत कई बार किसानों के लिए चुनौती बन जाती है, लेकिन पर प्रति बूंद अधिक फसल योजना इस परेशानी को काफी हद तक कम कर रही है. कई राज्यों में स्प्रिंकलर सिस्टम लगाने पर किसानों को 90 फीसदी तक सब्सिडी का लाभ दिया जा रहा है. इससे छोटे और सीमांत किसान भी इस तकनीक को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं.

कम लागत में बेहतर सिंचाई सुविधा मिलने से खेती पहले के मुकाबले ज्यादा लाभदायक बन रही है. सबसे बड़ी बात यह है कि पानी की बचत के साथ किसान एक ही संसाधन से ज्यादा क्षेत्र में खेती कर पा रहे हैं. बदलते मौसम और घटते जलस्तर के दौर में यह तकनीक खेती को टिकाऊ बनाने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने का भी मजबूत जरिया बनती जा रही है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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