धान की फसल में तेजी से फैल रहा यह रोग, कैसे करें बचाव?
Paddy Farming Tips: धान की फसल में साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस तेजी से फैल रहा है. जिससे पौधे बोने रह जाते हैं और पैदावार गिरती है. जानें इससे बचाव का तरीका.

Paddy Farming Tips: धान भारत की सबसे मुख्य फसलों में से एक है. लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी खेती पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है. धान की फसल में पौधों का छोटा रह जाना यानी ड्वार्फिंग डिसीज बहुत तेजी से फैल रही है. इसे वैज्ञानिक भाषा में साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस कहते हैं. इस खतरनाक वायरस के असर से धान के पौधे अपनी सही लंबाई तक नहीं बढ़ पाते और छोटे यानी नाटे ही रह जाते हैं. पौधों में बालियां बनती ही नहीं हैं या फिर बहुत कमजोर निकलती हैं.
जिससे फसल की पैदावार में 80 से 100 परसेंट तक का भारी नुकसान हो सकता है. शुरुआत में किसान इसे खाद या पोषण की कमी समझ लेते हैं और गलत दवाइयों या खादों का छिड़काव करने लगते हैं. जिससे उनका समय और पैसा दोनों बेकार चला जाता है. मौसम में अचानक बदलाव, ज्यादा नमी और सफेद पीठ वाले फुदके यानी व्हाइट बैक्ड प्लांटहॉपर के बढ़ने से यह बीमारी और भी तेजी से फैल रही है. अगर सही समय पर बीमारी को पहचानकर सही कदम न उठाए जाएं. तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है और किसानों को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है.
धान में बोनापन बीमारी के लक्षण और पहचान
धान के पौधों में इस खतरनाक बीमारी के लक्षण रोपाई के 15 से 30 दिनों के अंदर दिखने लगते हैं. बीमार पौधा आम पौधों से काफी छोटा, झाड़ी जैसा और गहरे हरे रंग का नजर आता है. पौधे की पत्तियां कड़क, मुड़ी हुई और हल्की पीली पड़ जाती हैं. जब बीमारी ज्यादा बढ़ जाती है. तो तने और पत्तियों की नसों पर काले या भूरे रंग की धारियां बनने लगती हैं. सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इन छोटे पौधों की जड़ें पूरी तरह बढ़ नहीं पातीं.
जिससे पौधा मिट्टी से जरूरी खुराक और पानी नहीं खींच पाता. फसल तैयार होने के समय इन पौधों में बालियां बिल्कुल नहीं निकलतीं या फिर बहुत छोटी और खाली रह जाती हैं. किसान अक्सर इसे जिंक या नाइट्रोजन की कमी समझ लेते हैं. अगर खेत में अचानक जगह-जगह पौधे छोटे दिखने लगें और उखाड़ने पर उनकी जड़ें सड़ी या गुच्छेदार लगें तो तुरंत समझ जाएं कि फसल में बोनापन वायरस आ चुका है.

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बीमारी फैलने की वजह और फैलाने वाले कीड़े
यह जानना बहुत जरूरी है कि यह वायरस सीधे मिट्टी या बीज से नहीं फैलता. बल्कि इसे फैलाने का काम एक कीड़ा करता है. इस बीमारी को फैलाने वाला मुख्य कीड़ा सफेद पीठ वाला फुदका यानी व्हाइट बैक्ड प्लांटहॉपर है. यह छोटा सा कीड़ा जब किसी बीमार पौधे का रस चूसता है. तो वायरस इसके अंदर चला जाता है. इसके बाद जब यही कीड़ा सही और स्वस्थ पौधों पर जाकर रस चूसता है. तो बीमारी को उन नए पौधों में भी फैला देता है.
तेज हवा के साथ यह फुदका एक खेत से दूसरे खेत में आसानी से उड़कर चला जाता है. जिससे आसपास के कई गांव और इलाके प्रभावित हो जाते हैं. खेत में ज्यादा पानी भरा रहना हर वक्त नमी रहना और जरूरत से ज्यादा यूरिया नाइट्रोजन डालना इस कीड़े की गिनती को बहुत तेजी से बढ़ा देता है. इसके अलावा खेत के आसपास घास और खरपतवार होना भी इन कीड़ों को छिपने और बढ़ने की जगह देता है. जिससे बीमारी और तेजी से फैलती है.
फसल को बचाने के असरदार उपाय
धान की फसल को इस खतरनाक बोनापन बीमारी से बचाने के लिए सही समय पर सही देखभाल बहुत जरूरी है. सबसे पहले, खेत में सफेद पीठ वाले फुदके पर नजर रखें. अगर एक पौधे पर 2 से 3 फुदके दिखने लगें तो तुरंत दवा छिड़कने की तैयारी करें. इन कीड़ों को खत्म करने के लिए ट्रिफ्लूमेजोपिरिम 10% SC या डिनोटेफ्यूरॉन 20% SG जैसी अच्छी कीटनाशक दवाओं का सही मात्रा में छिड़काव करें. यूरिया का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से ही करें और नीम कोटेड यूरिया का इस्तेमाल करें.
खेत में लगातार पानी भरकर न रखें बीच-बीच में पानी निकालकर खेत को थोड़ा सूखने दें जिससे कीड़ों का बढ़ना रुक सके. जो पौधे छोटे और बीमार दिखें, उन्हें तुरंत उखाड़कर मिट्टी में दबा दें या जला दें जिससे बीमारी दूसरे पौधों में न फैले. इसके साथ ही खेत की मेड़ों की सफाई रखें और अच्छी किस्म के बीजों का ही चुनाव करें. सही समय पर ध्यान देकर किसान अपनी धान की फसल को पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं.

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