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Peanut Cultivation: 4 महीने में मालामाल हो जायेंगे किसान, इस तरीके से करें मूंगफली की खेती

Kharif Crop Peanut Farming: 'गरीबों का काजू' नाम से मशहूर मूंगफली कैसे किसानों की गरीबी को सिर्फ 4 महिनों में बदल देती है, ये खेती की सही तकनीक पर निर्भर करता है.

Peanut Cultivation For Health And Wealth: एक प्रमुख तिलहनी फसल होने के साथ-साथ मूंगफली को खरीफ मौसम की महत्वपूर्ण फसल माना जाता है. गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक,आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मुख्य रूप इसकी खेती की जाती है. जून में बुवाई के बाद अक्टूबर तक इसकी कटाई का काम हो जाता है. जिससे सर्दियों तक किसानों की गरमा-गरम कमाई भी हो जाती है. गरीबों का काजू नाम से मशहूर मूंगफली कैसे किसानों की गरीबी को सिर्फ 4 महिनों में बदल देती है, ये खेती की सही तकनीक पर निर्भर करता है. इसलिये अच्छी कमाई हासिल करने के लिये जरूरी है कि मूंगफली की खेती को उन्नत बीज और आधुनिक तकनीक के साथ किया जाये. 

खेत की तैयारी
मूंगफली की फसल के लिये खेतों में 3-4  बार जुताई का काम कर लें. जुताई के बाद खेत में पाटा चलाकर समतलीकरण का काम कर लें, जिससे खेत की मिट्टी में नमी बरकरार रह सके. समतलीकरण के बाद खेत में जरूरत के हिसाब से जैविक खाद, जैव उर्वरक और पोषक तत्वों का भी प्रयोग करें, जिससे अच्छी उत्पादकता हासिल हो सके.

मूंगफली की बुवाई
खेत की तैयारी के बाद मूंगफली की बुवाई के लिये बीजों का उपचार कर लें. जिससे फसल में कीडे़ और बीमारियां न लग पायें. ध्यान रखें कि बुवाई के लिये उन्नत किस्म और अच्छी क्वालिटी के बीजों का ही इस्तेमाल करें. इससे फसल में  बीमारी लगने की संभावना कम हो जाती है. किसान 15 जून से 15 जुलाई तक नमी वाले खेतों में मूंगफली की बुवाई का काम कर सकते हैं. बुवाई के लिये 60-70 किलोग्राम बीजदर का इस्तेमाल प्रति हैक्टेयर के हिसाब से करें. 

फसल में सिंचाई
मूंगफली की फसल को पानी बचाने वाली फसल भी कहते हैं, क्योंकि इसकी सिंचाई पूरी तरह बारिश पर निर्भर करती है. इस बीच ध्यान रखें कि ज्यादा बारिश होने से पहले ही खेत में जल निकासी का इंतजाम कर दें, जिससे पानी फसल में न भर पाये. बता दें कि मूंगफली की फसल में पानी भरने से उसमें कीड़े और बीमारियां लगने की संभावना बढ़ जाती है. कम बारिश होने पर जरूरत के हिसाब से सिंचाई का काम करें.

कीट-रोग और खरपतवार नियंत्रण
मूंगफली की फसल में ज्यादा खरपतवार निकल आते हैं, जो उपज की क्वालिटी और पौध की बढ़वार को प्रभावित करते हैं. इसलिये बुवाई के 15 दिन बाद और 35 दिन बाद खेतों में निराई-गुड़ाई करके खेत में उगने वाली बेकार घास को उखाड़ फेंके. इसके अलावा, फसल में कीट और रोगों की भी निगरानी करते रहें और फसल में 15-15 दिन के अंतराल पर जरूरत के हिसाब से जैविक कीटनाशकों का ही इस्तेमाल करें.

 

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