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आम की फसल पर दिख रहे हैं काले धब्बे, जानें इस रोग से कैसे बचा सकते हैं फसल

Mangoes Black Tip Safety Tips: आम की फसल को कोयलिया रोग के काले धब्बों से बचाना अब आसान है. सही समय पर छिड़काव और एक्सपर्ट टिप्स अपनाकर आप अपनी उपज को सुरक्षित रख सकते हैं.

Mangoes Black Tip Safety Tips:  आम की फसल इस वक्त अपने सबसे जरूरी पड़ाव पर है. लेकिन बागवानों के लिए एक बड़ी टेंशन सामने खड़ी हो गई है. अगर आपके बाग में आम के फलों के निचले हिस्से पर काले धब्बे दिख रहे हैं और फल धीरे-धीरे काला होकर सड़ रहा है, तो समझ जाइए कि यह ब्लैक टिप यानी कोयलिया रोग का हमला है. 

यह बीमारी न केवल फल की सूरत बिगाड़ती है बल्कि उसकी मार्केट वैल्यू को भी जीरो कर देती है. अगर आप सही वक्त पर जागरूक नहीं हुए. तो आपकी पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर सकता है. मार्डन तकनीक और एक्सपर्ट्स की सलाह को अपनाकर आप इस बीमारी को न सिर्फ रोक सकते हैं बल्कि अपनी पैदावार को भी सुरक्षित बना सकते हैं. जान लीजिए तरीका.

क्या है कोयलिया रोग?

आम के फलों में होने वाले इस कालेपन को वैज्ञानिक भाषा में ब्लैक टिप कहा जाता है. जो अक्सर ईंट के भट्ठों से निकलने वाली गैसों की वजह से होता है. जब भट्ठों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें आम के छोटे फलों के संपर्क में आती हैं. तो फल के निचले हिस्से का टिश्यू मरने लगता है. इससे फल वहां से काला पड़ जाता है और समय से पहले ही गिर जाता है. यह समस्या उन बागों में ज्यादा देखी जाती है जो ईंट के भट्ठों के काफी करीब स्थित होते हैं.

  • ईंट के भट्ठों से निकलने वाला धुआं और सल्फर डाइऑक्साइड इस बीमारी का सबसे मुख्य कारण माना जाता है.
  • अगर आपके बाग के 1-2 किलोमीटर के दायरे में भट्ठा है, तो आपकी फसल को इस रोग का खतरा सबसे ज्यादा रहता है.

इस बीमारी की सही पहचान ही बचाव की पहली सीढ़ी है. जिससे आप समय रहते सही कदम उठा सकें और नुकसान को कम कर सकें.

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कोयलिया रोग से बचाव के तरीके

इस समस्या से निपटने के लिए आपको अपनी पुरानी पारंपरिक सोच को छोड़कर थोड़ा आधुनिक नजरिया अपनाना होगा. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट्स की मानें तो बोरेक्स या बोरोन का छिड़काव इस बीमारी के खिलाफ रामबाण साबित होता है. 

जब आम के फल मटर के दाने के बराबर हो जाएं तभी से सुरक्षात्मक छिड़काव शुरू कर देना चाहिए. इसके अलावा, बाग में नमी बनाए रखना भी बहुत जरूरी है जिससे गैसों का असर कम हो सके. सही डोज और सही समय पर स्प्रे करना ही आपकी फसल को इस काले घेरे से बाहर निकाल सकता है.

  • 10 लीटर पानी में करीब 60 ग्राम बोरेक्स मिलाकर छिड़काव करने से फलों में कालापन आने की समस्या काफी हद तक कम हो जाती है.
  • अगर बीमारी का असर ज्यादा दिख रहा है, तो 15 दिनों के अंतराल पर दूसरा स्प्रे करना फसल की सेफ्टी के लिए बहुत जरूरी है.

इन छोटे लेकिन जरूरी बदलावों को अपनाकर आप अपने आमों को फिर से वही चमक और मिठास दे सकते हैं जिसकी डिमांड मार्केट में रहती है.

बाग में सावधानी है सबसे जरूरी

सिर्फ दवाओं के छिड़काव से काम नहीं चलेगा. आपको अपने बाग के आसपास के वातावरण पर भी नजर रखनी होगी. अगर संभव हो तो ईंट भट्ठा संचालकों से बात करके सीजन के दौरान चिमनियों की ऊंचाई बढ़वाने की रिक्वेस्ट कर सकते हैं.

जिससे धुआं सीधे फलों तक न पहुंचे. तो इसके साथ ही जिन फलों में संक्रमण हो चुका है, उन्हें पेड़ से अलग करके नष्ट कर देना चाहिए जिससे दूसरे स्वस्थ फल बचे रहें. ध्यान रहें  प्रिवेंशन हमेशा क्योर से बेहतर होता है और आपकी थोड़ी सी सावधानी लाखों का मुनाफा बचा सकती है.

  • बाग की साफ-सफाई और समय पर सिंचाई करने से पेड़ों की इम्यूनिटी बढ़ती है जिससे वे रोगों से बेहतर लड़ पाते हैं.
  • हमेशा कोशिश करें कि एक्सपर्ट की सलाह के बाद ही किसी भी केमिकल का इस्तेमाल करें ताकि फल की क्वालिटी पर बुरा असर न पड़े.

अपनी खेती के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाकर कोयलिया रोग जैसी बीमारियों को मात देकर अपनी आम की फसल को बेहतर बना सकते हैं.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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