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बकरी पालन में नुकसान से बचना है? बदलते मौसम में अपनाएं ये 5 जरूरी सावधानियां

Goat Rearing Tips: क्लाइमेट चेंज के इस दौर में अपनी बकरियों को बीमारियों से बचाने के लिए अब आपको थोड़ा स्मार्ट होना पड़ेगा. एक्सपर्ट्स के बताए गए इन 5 तरीकों से आप बदलते मौसम के रिस्क को खत्म कर देंगे.

Goat Rearing Tips: आजकल क्लाइमेट चेंज की वजह से मौसम का मिजाज काफी अनप्रिडिक्टेबल हो गया है. जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा बकरी पालकों को भुगतना पड़ रहा है. कभी तेज धूप झुलसा देती है. तो अचानक होने वाली बेमौसम बारिश ठंड बढ़ा देती है. बकरियां स्वभाव से काफी सेंसिटिव होती हैं और तापमान में जरा सा भी उतार-चढ़ाव उनकी सेहत बिगाड़ सकता है. एक्सपर्ट्स की मानें तो इस बदलते दौर में अगर पशुपालक पुराने ढर्रे पर चलते रहे. 

तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. खासकर गर्भवती बकरियां और नन्हे मेमने इस बदलते मौसम की सबसे सॉफ्ट टारगेट होते हैं. ऐसे में स्मार्ट और साइंटिफिक मैनेजमेंट ही वह इकलौता तरीका है जो आपके पशुधन को निमोनिया और सांस की बीमारियों से बचा सकता है. चलिए जानते हैं एक्सपर्ट्स के बताए वो 5 मॉडर्न तरीके जिनसे आप अपने गोट फार्मिंग बिजनेस को एकदम सुरक्षित रख सकते हैं.

सबसे पहले करें शेड की व्यवस्था

अक्सर देखा जाता है कि गर्मी शुरू होते ही किसान शेड के पर्दे या बोरे हटा देते हैं. लेकिन अचानक हुई बारिश बकरियों को ठंड की चपेट में ले आती है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक अब आपको रेज़्ड प्लेटफॉर्म यानी जमीन से थोड़े ऊंचे बाड़े बनाने चाहिए जिससे नीचे से हवा का वेंटिलेशन बना रहे और नमी न रुके.

  • बाड़े की छत ऐसी हो जो गर्मी में ठंडी और सर्दी में गर्माहट दे सके. इसके साथ ही अचानक ठंड बढ़ने पर तुरंत कवर करने के लिए मजबूत पर्दों का इंतजाम रखें.
  • फर्श पर हमेशा सूखा बिछावन रखें क्योंकि गीली जगह बीमारियों का सबसे बड़ा गढ़ होती है. खासकर मेमनों के लिए सूखा बिस्तर लाइफ-सेवर होता है.

शेड मैनेजमेंट में की गई यह छोटी सी समझदारी आपके इलाज के भारी-भरकम खर्च को जीरो कर सकती है.

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खानपान का रखें खास ध्यान

बदलते मौसम में बकरियों की एनर्जी लेवल और इम्यूनिटी काफी गिर जाती है. इसलिए उनके खानपान में बदलाव करना बहुत जरूरी है. जब भी तापमान गिरे या बारिश हो. उन्हें एक्स्ट्रा एनर्जी देने के लिए दाना और संतुलित आहार की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए. जिससे उनका शरीर अंदर से गर्म रहे.

  • बकरियों को हमेशा साफ और हल्का गुनगुना पानी दें. क्योंकि एकदम ठंडा पानी उन्हें तुरंत बीमार कर सकता है.
  • आहार में मिनरल मिक्सचर और विटामिन्स का सही बैलेंस रखें जिससे उनकी नेचुरल रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे और वे मौसम की मार झेल सकें.

सही पोषण ही वह कवच है जो आपकी बकरियों को बिना किसी दवा के अंदरूनी तौर पर मजबूत बनाए रखता है.

सही नस्ल का चुनाव करें

एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि बिजनेस शुरू करते समय ऐसी नस्लों का चुनाव करें. जो आपके लोकल मौसम के हिसाब से खुद को ढाल सकें. जैसे ब्लैक बंगाल ब्रीड अपनी अडैप्टेबिलिटी के लिए मशहूर है. इसके साथ ही मौसम बदलने से पहले ही जरूरी बीमारियों के टीके लगवाना जरूरी है.

  • लोकल एनवायरनमेंट के प्रति फ्रेंडली नस्लें पालने से बीमारी का रिस्क 50% तक कम हो जाता है और मेंटेनेंस भी आसान रहता है.
  • मौसम के पूर्वानुमान (Weather Forecast) पर नजर रखें और बारिश या आंधी आने से पहले ही पशुओं को सुरक्षित शेड के अंदर शिफ्ट कर दें.

साइंटिफिक तरीके और सही ब्रीड का कॉम्बिनेशन ही आपके बकरी पालन के बिजनेस को लॉन्ग-टर्म में सक्सेसफुल बनाएगा.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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