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Fertilizer Subsidy: किसानों को खाद पर सब्सिडी देने के लिए कितना पैसा खर्च करती है सरकार? रकम जानकर उड़ेंगे होश

Fertiliser Subsidy: सरकार किसानों को सस्ती खाद देने के लिए हर साल लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है. जानिए खाद सब्सिडी का पूरा प्रोसेस और किसान को मिलने वाले फायदे.

Fertiliser Subsidy: खेती करना आज के समय में पहले जितना आसान नहीं रहा. बीज, डीजल, मजदूरी और खाद की बढ़ती कीमतें किसानों की परेशानी बढ़ा रही हैं. ऐसे में सरकार किसानों को राहत देने के लिए खाद पर भारी सब्सिडी देती है. यही वजह है कि जो खाद बाजार में काफी महंगी होती है, वही किसानों को कम कीमत में मिल जाती है. बता दें की खाद सब्सिडी एक तरह की सरकारी आर्थिक सहायता होती है, जो सीधे किसानों को नहीं बल्कि फर्टिलाइजर कंपनियों को दी जाती है. कंपनियां इस मदद के बाद किसानों को कम दाम पर खाद बेचती हैं. सरकार का मकसद साफ है कि किसान पर खेती का बोझ कम पड़े और फसल उत्पादन प्रभावित न हो. यही कारण है कि हर साल सरकार किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है.

किन खादों पर मिलती है सब्सिडी और क्यों खास है यूरिया?

सरकार कई तरह की खादों पर सब्सिडी देती है, जिनमें UREA, DAP (डायमोनियम फॉस्फेट), MOP (म्यूरेट ऑफ पोटाश) और NPK जैसी मिक्स्ड फर्टिलाइजर शामिल हैं. इनमें सबसे ज्यादा सब्सिडी यूरिया पर दी जाती है. यही वजह है कि यूरिया की कीमत बाकी खादों की तुलना में काफी कम रहती है. जानकारी के मुताबिक यूरिया की एक बोरी की असली कीमत करीब 2400 रुपये तक पड़ती है, लेकिन किसानों को यह लगभग 265 रुपये में मिल जाती है. बाकी पैसा सरकार कंपनियों को सब्सिडी के रूप में देती है. वहीं अगर सरकार यह मदद न करे तो खेती की लागत इतनी बढ़ सकती है कि छोटे किसानों के लिए फसल उगाना मुश्किल हो जाए. यही कारण है कि सरकार हर साल करीब 2 लाख करोड़ रुपये तक खाद सब्सिडी पर खर्च कर देती है. यह रकम सुनकर किसी के भी होश उड़ सकते हैं, लेकिन किसानों के लिए यही राहत खेती को संभाले हुए है.

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आखिर किसानों तक कैसे पहुंचती है सस्ती खाद?

बहुत से लोगों के मन में सवाल होता है कि आखिर यह सब्सिडी किसानों तक पहुंचती कैसे है. इसका पूरा प्रोसेस काफी आसान लेकिन जरूरी होता है. सबसे पहले फर्टिलाइजर कंपनियां खाद का उत्पादन करती हैं और उसे बाजार में भेजती हैं. जब किसान खाद खरीदने दुकान पर पहुंचता है, तब दुकानदार पॉइंट ऑफ सेल यानी POS मशीन में किसान का आधार नंबर या मोबाइल नंबर दर्ज करता है. आधार के जरिए किसान की पहचान की जाती है, जिससे यह तय हो जाता है कि खाद सही व्यक्ति को ही दी जा रही है. जैसे ही बिक्री दर्ज होती है, कंपनियां सरकार से सब्सिडी क्लेम कर लेती हैं और फिर सरकार उन्हें आर्थिक सहायता दे देती है. इस पूरी प्रक्रिया में किसानों के लिए आधार कार्ड होना जरूरी होता है. साथ ही मोबाइल नंबर आधार से लिंक होना चाहिए और खाद हमेशा अधिकृत दुकानों से ही खरीदनी चाहिए. सही जानकारी देने पर ही किसान इस सुविधा का फायदा आसानी से उठा पाते हैं.

किसानों को क्या फायदा और सरकार के सामने क्या चुनौती?

खाद सब्सिडी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसानों को कम कीमत में खाद मिल जाती है, जिससे खेती का खर्च काफी घट जाता है. सस्ती खाद मिलने से किसान ज्यादा उत्पादन कर पाते हैं और फसल की पैदावार भी बढ़ती है. इसके अलावा सरकार की निगरानी के कारण कालाबाजारी और जमाखोरी पर भी काफी हद तक नियंत्रण बना रहता है. वहीं दूसरी तरफ सरकार पर इसका आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. साथ ही बढ़ती आबादी और खेती की जरूरतों के कारण हर साल सब्सिडी का खर्च बढ़ रहा है. यही वजह है कि अब सरकार जैविक और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है, ताकि रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो और मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनी रहे. लेकिन फिलहाल के लिए खाद सब्सिडी करोड़ों किसानों के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं है.

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