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क्या खेत में बिजली गिरने से सच में बढ़ जाती है मिट्टी की उर्वरता, कितनी सच है ये बात?

Soil Fertility Tips: आसमानी बिजली कड़कने से हवा की नाइट्रोजन बारिश के पानी के साथ मिलकर नाइट्रेट बनकर मिट्टी में समा जाती है. यह फसलों के लिए नेचुरल यूरिया का काम करती है.

Soil Fertility Tips: अक्सर जब आसमान में बिजली चमकती है या गरजती है तो हमारे मन में डर बैठ जाता है कि कहीं कोई नुकसान न हो जाए. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह कड़कती हुई बिजली आपके खेतों के लिए एक नेचुरल वरदान भी हो सकती है? गांवों में अक्सर बुजुर्गों को कहते सुना होगा कि आसमानी बिजली गिरने से मिट्टी की ताकत बढ़ जाती है. 

पहली बार सुनने में यह बात किसी कहानी जैसी लग सकती है लेकिन मॉडर्न साइंस इस बात को पूरी तरह सच मानता है. असल में यह प्रकृति का एक बहुत ही एडवांस और अनोखा तरीका है जिससे मिट्टी को बिना किसी केमिकल के डायरेक्ट पोषण मिलता है. चलिए आपको बताते हैं इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक सच के बारे में पूरी जानकारी.

आसमानी बिजली से बढ़ती है मिट्टी की उर्वरता?

हमारी हवा में लगभग 78 परसेंट नाइट्रोजन गैस मौजूद होती है. लेकिन पौधे इसे डायरेक्ट हवा से एब्जॉर्ब नहीं कर सकते. जब आसमान में बिजली कड़कती है. तो वहां का तापमान और प्रेशर पल भर के लिए बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. यह खतरनाक एनर्जी हवा में मौजूद नाइट्रोजन और ऑक्सीजन को आपस में कंबाइन कर देती है.

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जिससे नाइट्रोजन ऑक्साइड्स बनते हैं. इसके बाद जब बारिश होती है तो यह गैस पानी के साथ मिलकर नाइट्रेट्स में बदल जाती है और सीधे मिट्टी में समा जाती है. पौधे इस नाइट्रेट को बहुत आसानी से अपनी जड़ों के जरिए सोख लेते हैं. जिससे उन्हें नेचुरल यूरिया मिल जाता है.

फसलों को होता है फायदा

यह नेचुरल प्रोसेस खेतों के लिए किसी महंगे फर्टिलाइजर के बूस्टर डोज की तरह काम करता है. बिजली गिरने या कड़कने के बाद होने वाली बारिश से मिट्टी की उर्वरता यानी उसकी उपजाऊ शक्ति में अचानक बड़ा उछाल आता है. इससे पौधों की ग्रोथ तेज हो जाती है. उनकी पत्तियां ज्यादा हरी-भरी दिखती हैं और फसलों की क्वालिटी भी सुधरती है. 

मिट्टी की सेहत सुधर जाती है

सबसे अच्छी बात यह है कि इस पूरी प्रोसेस में मिट्टी को जो नाइट्रोजन मिलती है. उससे जमीन की सेहत को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. हालांकि सीधे खेत पर बिजली गिरना फसलों और जान-माल के लिए खतरनाक है. लेकिन वायुमंडल में इसका कड़कना मिट्टी के लिए फायदेमंद है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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