हाफिज़ और मौलाना कैसे चलाते हैं अपना घर, क्या है इनकी आमदनी का जरिया, कितनी होती है कमाई?
Hafiz and Maulana Income: मौलाना और हाफ़िज मुअज्जिन, मदरसा शिक्षक या ऑनलाइन कुरान शिक्षक के रूप में कार्य करते हैं और वेतन, फीस, हदिया या अन्य पेशों से आजीविका कमाते हैं.

Hafiz and Maulana Source of Income News: कुर्ता-पायजामा, बंडी, शेरवानी और कभी-कभी जुब्बा व दस्तार में मलबूस (पहने) मौलाना और हाफ़िज़ को लेकर यह सवाल आम ज़ेहन में आता है कि आखिर वे अपने रोज़मर्रा का खर्च कैसे निकालते हैं, घर चलाने के लिए क्या काम और पेशा अख्तियार करते हैं. उनकी कमाई कितनी होती है और उनके पास काम करने के क्या-क्या अवसर होते हैं.
मदरसे में पढ़े-लिखे मौलाना और हाफ़िज़ की कमाई से जुड़े सवाल के जवाब में दिल्ली में वक्फ बोर्ड की मस्जिद से जुड़े मौलाना एजाज़ अहमद का कहना है कि इस्लाम में बतौर पेशा सबसे ज़्यादा कारोबार को अहमियत दी गई है. इस मामले में उनका कहना है कि वैसे मदरसे से पढ़े-लिखे मौलाना और हाफ़िज़ के पास मस्जिदों में इमामत और मुअज्जिन, मदरसों में बतौर मुअल्लिम और दूसरे एजुकेशन सेंटर व कोचिंग सेंटर में बतौर इस्लामियात के टीचर काम करने के विकल्प होते हैं. ख़ानकाहों और मज़ारों पर भी वे नौकरी करते हैं.
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यह बात ज़ेहन में याद रखें कि हाफ़िज़ या मौलवी की कमाई का कोई तय ज़रिया नहीं होता. उनकी आमदनी इस बात पर निर्भर करती है कि वे क्या काम कर रहे हैं. जैसे अगर कोई हाफ़िज़ या मौलाना-मौलवी मस्जिद में इमाम के तौर पर काम करते हैं तो उन्हें मस्जिद की कमेटी या ट्रस्ट की ओर से वेतन मिलता है. तनख्वाह कितनी होगी, यह शहर और इलाके के साथ-साथ मस्जिद कितनी बड़ी और अहम है, उसके हिसाब से तय होता है. दिल्ली जैसे शहर में आमतौर पर एक मस्जिद के इमाम की सैलरी 15 से 30 हजार रुपए के बीच होती है.
- मस्जिद में इमाम के अलावा, मुअज्जिन भी मदरसे के पढ़े-लिखे छात्र होते हैं. उनका रुतबा और सैलरी इमाम के मुकाबले कम होती है. मुअज्जिन का काम मस्जिद में पांच वक्त की अज़ान देना होता है. साथ ही मस्जिद की साफ़-सफ़ाई की ज़िम्मेदारी भी उनके ही ज़िम्मे होती है.
- इसके साथ ही हाफ़िज़ और मौलाना मदरसों में बच्चों को क़ुरआन या दीनी तालीम देते हैं. उन्हें भी संस्थान की ओर से वेतन दिया जाता है. इसके अलावा बच्चों के माता-पिता हदिया (तोहफा) देते हैं. मुसलमानों में इस्लामी काम करने वालों को हदिया देने का चलन है.
- रमज़ान के महीने में कई मस्जिदों में तरावीह की नमाज़ (रमज़ान की खास नमाज़) में पूरा क़ुरआन सुनाने का खास एहतेमाम किया जाता है. इस काम के बदले उन्हें हदिया मिलता है.
- ऑनलाइन एजुकेशन के बढ़ते चलन का असर इस्लामी शिक्षा में भी देखने को मिल रहा है. आज के समय में कई हाफ़िज़ घरों या ऑनलाइन माध्यम से भी बच्चों और बड़ों को क़ुरआन पढ़ाते हैं. इसके बदले वे फीस या मानदेय लेते हैं. कुछ हाफ़िज़ नौकरी, कारोबार या दूसरे पेशों से भी अपनी आजीविका चलाते हैं.
कौन होते हैं हाफ़िज़?
हाफ़िज़-ए-क़ुरआन वह होते हैं, जिन्होंने पूरा क़ुरआन हिफ्ज़ यानी याद किया होता है. हाफ़िज़ होना अपने आप में कोई नौकरी या पद नहीं होता. इसलिए हाफ़िज़ की कोई नियमित आय भी नहीं होती.
कौन होते हैं मौलाना?
मौलाना इस्लाम के ऐसे आलिम को कहा जाता है, जिन्होंने दीनी तालीम हासिल की हो. उन्हें क़ुरआन और इस्लामी तालीम की अच्छी समझ होती है.
इस्लाम धर्म में वैसे तो तालीम देने और इमामत के बदले आय की नीयत नहीं रखी जाती, लेकिन इस्लामी विद्वानों के अनुसार, ज़रूरत होने पर क़ुरआन की तालीम देने या इमामत करने के बदले वेतन या फीस लेना जायज़ माना गया है.
























