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AI का जादू या डेटा की जासूसी? विदेशी टूल खोलते ही आपका फोन बन जाता है ‘खुली किताब’, सरकारें क्यों हुईं अलर्ट

AI Data Privacy: आधुनिक AI प्लेटफॉर्म कई तरह के डेटा को एक साथ जोड़कर काम करते हैं. इसमें स्वास्थ्य रिकॉर्ड, बैंकिंग लेन-देन, लोकेशन से जुड़ी जानकारी शामिल होती हैं.

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  • एआई के इस्तेमाल से निगरानी का दायरा और जवाबदेही बढ़ेगी।

AI Data Privacy: आज दुनिया भर की सरकारें Artificial Intelligence का तेजी से इस्तेमाल कर रही हैं ताकि प्रशासन, स्वास्थ्य सेवाएं और सार्वजनिक सुविधाएं बेहतर बनाई जा सकें. यह तकनीक काम को तेज और आसान जरूर बनाती है लेकिन इसके साथ एक गंभीर सवाल भी जुड़ गया है आखिर नागरिकों के डेटा पर असली कंट्रोल किसका है खासकर तब जब ये सिस्टम विदेशी कंपनियों द्वारा बनाए गए हों.

AI सिस्टम किस तरह का डेटा इस्तेमाल करते हैं

आधुनिक AI प्लेटफॉर्म कई तरह के डेटा को एक साथ जोड़कर काम करते हैं. इसमें स्वास्थ्य रिकॉर्ड, बैंकिंग लेन-देन, लोकेशन, पहचान से जुड़ी जानकारी और यहां तक कि व्यवहार से जुड़े पैटर्न भी शामिल होते हैं. भारत जैसे देश में, जहां Aadhaar और UPI जैसे डिजिटल सिस्टम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है डेटा की मात्रा बेहद विशाल हो चुकी है.

AI इन अलग-अलग सूचनाओं को जोड़कर किसी व्यक्ति की विस्तृत प्रोफाइल तैयार कर सकता है जो नीतियां बनाने में मददगार तो है लेकिन प्राइवेसी के लिए चिंता का विषय भी बन सकता है.

विदेशी प्लेटफॉर्म और डेटा का कंट्रोल

जब सरकारें विदेशी AI प्लेटफॉर्म का सहारा लेती हैं तो स्थिति थोड़ी जटिल हो जाती है. भले ही डेटा देश के भीतर स्टोर किया जाए लेकिन उसे प्रोसेस करने वाले सॉफ्टवेयर और उनके नियम अक्सर बाहरी कंपनियों के नियंत्रण में होते हैं.

उदाहरण के लिए, CLOUD Act जैसे कानून कुछ परिस्थितियों में विदेशी कंपनियों से डेटा मांगने की अनुमति देते हैं. इसका मतलब यह हो सकता है कि भारतीय नागरिकों का डेटा अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे देशों की पहुंच में आ जाए.

भारत का डेटा सुरक्षा कानून क्या कहता है

भारत ने इस चुनौती से निपटने के लिए Digital Personal Data Protection Act 2023 लागू किया है. यह कानून तय करता है कि डेटा कैसे जुटाया जाए, कैसे इस्तेमाल हो और कब तक रखा जाए. इसमें नागरिकों को अपने डेटा पर अधिकार भी दिए गए हैं जैसे उसे देखना, सुधारना या हटवाना. हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मामलों में सरकार को कुछ छूट भी मिलती है जिससे पूरी पारदर्शिता हमेशा संभव नहीं होती.

AI के बढ़ते इस्तेमाल से नए खतरे

AI सिस्टम का एक बड़ा प्रभाव निगरानी के बढ़ते दायरे के रूप में सामने आ रहा है. जब अलग-अलग डेटा को जोड़ दिया जाता है तो किसी व्यक्ति की गतिविधियों और व्यवहार को ट्रैक करना आसान हो जाता है. यह तकनीक धोखाधड़ी पकड़ने या स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए उपयोगी हो सकती है लेकिन इससे लोगों को बिना जानकारी के जोखिम के आधार पर आंकने का खतरा भी बढ़ जाता है. साथ ही, इन सिस्टम्स की कार्यप्रणाली पूरी तरह साफ नहीं होती जिससे जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है.

डेटा संप्रभुता क्यों बन रही है बड़ा मुद्दा

डेटा संप्रभुता का मतलब है कि किसी देश को अपने नागरिकों के डेटा पर पूरा नियंत्रण होना चाहिए. भारत दुनिया के सबसे बड़े डेटा उत्पादकों में से एक बन चुका है लेकिन अभी भी टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है. यही विरोधाभास सबसे बड़ी चुनौती है एक तरफ आधुनिक तकनीक का फायदा उठाना जरूरी है वहीं दूसरी तरफ अपने डेटा की सुरक्षा और नियंत्रण बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ता है

हर बार जब आप डिजिटल पेमेंट करते हैं किसी सरकारी योजना का लाभ लेते हैं या ऑनलाइन स्वास्थ्य सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं तब आप नया डेटा बना रहे होते हैं. यह डेटा तय कर सकता है कि आपको कौन-सी सेवाएं मिलेंगी आप किन योजनाओं के पात्र हैं और सिस्टम आपको किस नजर से देखता है. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि आपका डेटा कैसे और किसके द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है.

आगे की राह और बड़ा सवाल

जैसे-जैसे AI का दायरा बढ़ रहा है असली सवाल यह नहीं रह गया कि डेटा का उपयोग हो रहा है या नहीं बल्कि यह है कि इसका इस्तेमाल किन शर्तों पर और किसके नियंत्रण में हो रहा है. भारत जैसे बड़े डिजिटल देश के लिए यह फैसला बेहद अहम है क्योंकि आज लिए गए निर्णय आने वाले समय में नागरिकों की गोपनीयता, सुरक्षा और अधिकारों की दिशा तय करेंगे.

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