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Tech Explained: कैसे काम करती है लोकेशन ट्रैकिंग? जानिए इससे जुड़े सारे सवालों के जवाब

आप घर बैठे-बैठे देश-दुनिया के किसी भी कोने में चल रही गाड़ी या ऑर्डर किए गए आइटम को ट्रैक कर सकते हैं. लेकिन क्या आपने सोचा है कि यह टेक्नोलॉजी काम कैसे करती है?

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आज की दुनिया में छिपना मुश्किल हो गया है. इसका मतलब है कि आपको हर जगह कैमरा मिल जाएंगे. चाहे आपकी गाड़ी रेड लाइट पर खड़ी है, आप किसी स्टोर या ऑफिस में घूम रहे हैं, हर जगह कैमरा की आप पर नजर है. अब ऐसी टेक्नोलॉजी भी आ गई है, जो बिना कैमरा भी आप पर नजर रखती है. हम लोकेशन ट्रैकिंग की बात कर रहे हैं, जो आपकी गाड़ी, मोबाइल फोन और ऑनलाइन ऑर्डर किए प्रोडक्ट पर नजर रखती है. इसके लिए न तो कैमरा की जरूरत पड़ती है और न ही आपको कोई भारी-भरकम डिवाइस लेकर चलने की जरूरत है. आप हजारों किलोमीटर दूर बैठे देख सकते हैं कि कोई ट्रेन कहां तक पहुंच गई है या आपका ऑर्डर किया आइटम अभी किस वेयरहाउस में हैं. यह सब लोकेशन ट्रैकिंग के कारण संभव हो पाया है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी स्क्रीन पर कैसे पता चल जाता है कि आपका सामान कहां है या आपका ड्राइवर गाड़ी लेकर किस सड़क पर जा रहा है? आज हम आपको ऐसे ही सवालों का जवाब बताने जा रहे हैं. आज के एक्सप्लेनर में हम जानेंगे कि लोकेशन ट्रैकिंग क्या होती है और यह किस तरह काम करती है.

क्या है लोकेशन ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी?

लोकेशन ट्रैकिंग कोई एक सिंगल टेक्नोलॉजी नहीं है बल्कि यह कई अलग-अलग टेक्नोलॉजी का मिक्स है, जिन्हें इस्तेमाल कर ऐसा सिस्टम बनाया जाता है, जो इन्वेंट्री, पशुओं और गाड़ियों आदि पर नजर रख सकता है. ऐसा ही सिस्टम मोबाइल जैसे वायरलेस डिवाइस पर लोकेशन-बेस्ड सर्विसेस डिलीवर करने के लिए बनाया जा सकता है. आज हम जो लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम यूज करते हैं, उनमें नीचे दी गई टेक्नोलॉजीज को यूज किया जा रहा है.

जियोग्राफिक इंफोर्मेशन सिस्टम (GIS) - बड़े स्तर के लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम के लिए जियोग्राफिक इंफोर्मेशन कैप्चर और स्टोर करना जरूरी होता है. जियोग्राफिक इंफोर्मेशन सिस्टम उसी जियोग्राफिक इंफो को कैप्चर, स्टोर, एनालाइज और रिपोर्ट करता है.

ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम (GPS) - धरती से ऊपर स्पेस में 27 सैटेलाइट लगातार घूमते रहते हैं. आपके मोबाइल फोन या गाड़ी में लगा GPS रिसीवर इनमें से 4 या उससे ज्यादा सैटेलाइट की मदद से लोकेशन का पता लगाता रहता है. इसे शुरुआत में मिलिट्री यूज के लिए बनाया गया था और अब यह सर्वे, खेतीबाड़ी, ट्रांसपोर्टेशन जैसे कई कामों में यूज किया जा रहा है. यह आउटडोर पॉजिशनिंग के लिए बेस्ट है.

रेडियो फ्रीक्वैंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) - ये बिना बैटरी वाली माइक्रोचिप्स होती हैं, जिन्हें किसी सामान, जानवर, गाड़ी या दूसरे ऑब्जेक्ट से अटैच कर उनकी मूवमेंट को ट्रैक किया जा सकता है. RFID टैग पैसिव होते हैं. यानी केवल किसी रीडर के प्रॉम्प्ट करने पर ही ये डेटा ट्रांसमिट करते हैं. यह रीडर रेडियो वेव्ज ट्रांसमिट करता है, जिससे RFID टैग एक्टिवेट हो जाता है और फिर रेडियो फ्रीक्वैंसी पर डेटा ट्रांसमिट करता है.

वायरलेस लोकल एरिया नेटवर्क (WLAN) - यह रेडियो फ्रीक्वैंसी से कनेक्टेड डिवाइसेस का एक नेटवर्क होता है. यह भी रेडियो वेव्ज के जरिए डेटा पास करता है और यह नेटवर्क 70-300 फीट की रेंज में काम कर सकता है.

आज के समय में हम जो भी लोकेशन-बेस्ड सर्विस सिस्टम यूज कर रहे हैं, उसमें इनमें से एक या एक से ज्यादा टेक्नोलॉजी का कॉम्बिनेशन काम कर रहा है.

कितने टाइप की होती है ट्रैकिंग?

वाइड-एरिया ट्रैकिंग- जब बड़े स्केल की बात आती है तो कंपनियों को देशभर में अपने व्हीकल्स ट्रैक करने पड़ते हैं. इसके लिए GPS सबसे बेहतर ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी है. इसके लिए गाड़ियों में GPS रिसीवर फिट किए जाते हैं. फिर सैटेलाइट की मदद से इन्हें ट्रैक करना आसान हो जाता है. 

लोकल एरिया या इनडोर ट्रैकिंग- बड़े स्तर पर GPS एक कमाल की टेक्नोलॉजी है, लेकिन वेयरहाउस या हॉस्पिटल जैसी इनडोर जगहों पर यह असर कम हो जाता है. ऐसी जगहों के लिए RFID टैग्स यूज किए जाते हैं. इसके अलावा WLAN को भी ऐसी जगहों पर इस्तेमाल में लाया जाता है. RFID टैग की मदद से ही बड़े-बड़े वेयरहाउस में सामान का पता लगाया जाता है. आजकल क्विक कॉमर्स के कारण इनका इस्तेमाल और ज्यादा हो गया है. RFID टैग का इस्तेमाल आजकल अम्यूजमेंट पार्क्स में बच्चों की ट्रैकिंग के लिए भी किया जाने लगा है. इसके लिए उन्हें एक खास रिस्टबैंड पहनाया जाता है. इससे बच्चों के गुम होने का डर नहीं रहता.

लोकेशन-बेस्ड सर्विसेस

आजकल मोबाइल फोन सिर्फ कॉल या मैसेज करने का डिवाइस नहीं रह गए हैं. इन पर इंटरनेट के जरिए शॉपिंग समेत तमाम तरह की सुविधाएं मिलने लगी हैं. आने वाले दिनों में मोबाइल पर और अधिक लोकेशन-बेस्ड सर्विसेस देखने को मिलेगी. लोकेशन-अवेयर टेक्नोलॉजी के आने के बाद ये सर्विसेस लोकेशन के आधार पर यूजर्स को पर्सनलाइज्ड सर्विसेस ऑफर करेंगी. अभी इसका सबसे बड़ा उदाहरण नेविगेशन सिस्टम है. इसकी मदद से अगर आपको किसी कैफे जाना है तो यह सिस्टम आपकी लोकेशन से उसका सीधा रास्ता दिखा देगा और आपको कैफे तक पहुंचा भी सकता है. इसमें ट्रैफिक एडवायजरी और रोडसाइड असिस्टेंस जैसे भी सर्विसेस होती हैं. इसी तरह अगर छोटी जगहों पर इसका यूज देखें तो मॉल्स और दूसरे इनडोर एरियाज में WLAN का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें जैसे ही आप किसी स्टोर पर जाते हैं, रिटेलर्स आपके पास कूपन या ऑफर की जानकारी भेज देते हैं.

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