Tubelight Technology: ट्यूबलाइट को फोड़ने पर क्यों होता है धमाका, इसमें क्यों भरी जाती है गैस?
Tubelight Technology: ट्यूबलाइट फोड़ने पर आने वाली पटाखे जैसी तेज आवाज आती है पर क्या कभी सोचा है कि यह धमाका आखिर होता क्यों है? इसके अंदर क्यों भी जाती है गैस जान लें.

Tubelight Technology: आजकल भले ही हमारे घरों में एलईडी बल्ब और मॉडर्न लाइट्स लग गई हैं. लेकिन वह पुरानी कांच वाली लंबी ट्यूबलाइट आज भी हमें याद है. बचपन में जब कभी घर की कोई ट्यूबलाइट खराब हो जाती थी तो शरारत में बच्चे उसे खाली मैदान में ले जाकर पत्थर मारकर फोड़ दिया करते थे. जैसे ही उस पर पत्थर लगता था पट की एक बहुत तेज आवाज आती थी मानो कोई छोटा पटाखा फूटा हो.
उस वक्त हम सब यही सोचते थे कि शायद इसके अंदर कोई बारूद या खतरनाक गैस भरी है. जो बाहर निकलते ही फट जाती है. लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? असल में ट्यूबलाइट के फूटने पर आने वाली आवाज के पीछे कोई विस्फोट नहीं बल्कि इसके अंदर जो गैस और सफेद पाउडर भरा जाता है. चलिए आपको बताते हैं क्यों होता है ट्यूबलाइट फोड़ने पर धमाका और इसमें क्यों भरी जाती है गैस.
बाहर नहीं बल्कि अंदर की तरफ होता है धमाका
लोगों को लगता है ट्यूबलाइट फूटने पर अंदर की हवा बाहर निकलती है इसलिए धमाका होता है. लेकिन होता इसके बिल्कुल उलट है इसे साइंस की भाषा में एक्सप्लोजन नहीं बल्कि इम्प्लोजन यानी अंतःस्फोट कहते हैं. आसान शब्दों में समझें तो जब ट्यूबलाइट बनाई जाती है तो उसके अंदर से लगभग सारी हवा निकाल कर वैक्यूम बना दिया जाता है. इसकी वजह से ट्यूबलाइट के अंदर का एयर प्रेशर बाहर के माहौल के मुकाबले बहुत ही कम लगभग 0.3 प्रतिशत होता है.
अब जब आप ट्यूबलाइट पर पत्थर मारते हैं और कांच टूटता है. तो बाहर की हाई-प्रेशर वाली हवा खाली जगह को भरने के लिए बहुत ही तेज रफ्तार से अंदर की तरफ घुसती है. हवा की इसी तेज रफ्तार और कांच के टुकड़ों के आपस में टकराने से एक जोरदार शॉकवेव पैदा होती है. जो हमें पटाखे जैसे धमाके की तरह सुनाई देती है. यानी यह धमाका बाहर की तरफ नहीं बल्कि अंदर की तरफ हवा घुसने से होता है.

क्यों भरी जाती है इसमें गैस?
अब सवाल यह है कि अगर अंदर से हवा निकाल दी जाती है तो फिर इसमें कौन सी गैस डाली जाती है और क्यों? तो बता दें हवा निकालने के बाद ट्यूबलाइट के अंदर बेहद कम मात्रा में Argon या Neon जैसी इनर्ट गैस और थोड़ा सा पारा यानी Mercury डाला जाता है. नार्मल हवा के रहने पर ट्यूबलाइट के दोनों किनारों पर लगे फिलामेंट तुरंत जलकर राख हो सकते हैं. इसलिए ऑक्सीजन हटाकर आर्गन गैस भरी जाती है जो फिलामेंट की उम्र बढ़ाती है और करंट के फ्लो को आसान बनाती है.
जब आप स्विच ऑन करते हैं तो फिलामेंट गर्म होकर इलेक्ट्रॉन्स छोड़ते हैं. यह इलेक्ट्रॉन्स आर्गन गैस की मदद से ट्यूब में मौजूद पारे के कणों से टकराते हैं. इस टक्कर से अंदर अल्ट्रावॉयलेट' (UV) किरणें पैदा होती हैं. लेकिन हमारी आंखें इस यूवी लाइट को नहीं देख सकतीं. यहीं काम आता है ट्यूबलाइट के अंदर पुता हुआ वह सफेद पाउडर जिसे फॉस्फर कहते हैं. यूवी किरणें जब इस पाउडर से टकराती हैं तब जाकर हमें दूधिया सफेद रोशनी दिखती है.

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सेहत के लिए हो सकती है खतरनाक
ट्यूबलाइट फोड़ना सेहत के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है. जैसा कि हमने जाना कि इसके अंदर रोशनी पैदा करने के लिए मर्करी यानी पारे की भाप और फॉस्फर पाउडर का इस्तेमाल होता है. मर्करी एक बहुत ही जहरीला तत्व है. जब कोई ट्यूबलाइट फूटती है तो कांच के टुकड़ों के साथ-साथ यह पारा और सफेद पाउडर भी हवा में फैल जाता है. अगर कोई इंसान इसे सांस के जरिए अपने फेफड़ों में खींच ले या यह पाउडर किसी खुले घाव पर लग जाए.
तो इससे गंभीर इंफेक्शन और नर्वस सिस्टम से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं. अगर कभी घर के अंदर गलती से ट्यूबलाइट टूट जाए तो तुरंत कमरे की खिड़कियां खोल देनी चाहिए और पंखा बंद कर देना चाहिए जिससे जहरीली हवा पूरे घर में न फैले. इसके टुकड़ों को कभी भी नंगे हाथों से न उठाएं बल्कि किसी मोटे कागज की मदद से साफ उठाएं.
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