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हर साल क्यों कम होती जाती है सोलर पैनल की एफिशिएंसी, किन चीजों से पड़ता है असर? जानें

Solar Panel Degradation: सोलर पैनल की एफिशिएंसी बहुत मायने रखती है. हालांकि, हर साल यह कम होती जाती है और 25 साल बाद पैनल की एफिशिएंसी 80-85 प्रतिशत ही रह जाती है.

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  • 25 साल में 12-20% गिरावट, नियमित रखरखाव से धीमा होता है।

Solar Panel Degradation: सोलर पैनल आसानी से 20-25 साल तक चल जाते हैं, लेकिन इनकी परफॉर्मेंस लगातार एक जैसी नहीं रहती. हर प्रकार के पैनल की एफिशिएंसी हर साल कम होती जाती है. इसे सोलर पैनल डिग्रेडेशन कहा जाता है और इसका सीधा असर आपकी छत पर लगे सोलर सिस्टम पर पड़ता है. जैसे-जैसे पैनल पुराने होते जाते हैं, इनसे जनरेट होने वाली बिजली कम होती जाती है. आज हम जानेंगे कि इसके पीछे क्या कारण होते हैं और समय के साथ सोलर पैनल की एफिशिएंसी कितनी कम हो जाती है.

क्यों होता है Solar Panel Degradation?

सेमीकंडक्टर में हीट बिल्ड-अप होना- सोलर पैनल में सेमीकंडक्टर सेल्स लगी होती हैं, जिनसे इलेक्ट्रिक चार्ज फ्लो होता है. करंट गुजरने के दौरान इनमें हीट पैदा होती है. लगातार हीट जनरेट होने के कारण सनलाइट से बिजली बनाने की इनकी क्षमता कमजोर हो जाती है.
मैटेरियल डिग्रेडेशन- सोलर पैनल के कंपोनेंट लगातार धूप में रहते हैं और इनमें इलेक्ट्रिक एक्टिविटीज चलती रहती है. इस कारण मैटेरियल भी खराब होने लगता है, जिसका असर एफिशिएंसी पर पड़ता है.
हैंडलिंग और इंस्टॉलेशन- सोलर पैनल को हैंडल और इंस्टॉल करने के तरीका का भी एफिशिएंसी पर असर पड़ता है. खराब हैंडलिंग, लूज कनेक्शन और माउंटिंग में गड़बड़ आदि के कारण पैनल डैमेज हो सकते हैं, जिससे एफिशिएंसी कम हो जाती है.
सफाई न होना- सोलर पैनल की सफाई करना जरूरी है. अगर पैनल पर धूल-मिट्टी जम जाए तो यह सनलाइट को ब्लॉक कर सकती है, जिससे पावर जनरेशन कम होने लगता है.

पहले साल होता है सबसे ज्यादा डिग्रेडेशन

अगर आप सोच रहे हैं कि पैनल पुराने होने पर 15-20 सालों बार पैनल डिग्रेडेशन सबसे ज्यादा होता है तो ऐसा नहीं है. सबसे ज्यादा पैनल डिग्रेडेशन पहले साल ही हो जाता है, जब पैनल लैब टेस्टिंग से बाहर आकर असल दुनिया की परिस्थितियों का सामना करते हैं. पहले साल इसमें करीब 0.7-0.8 प्रतिशत डिग्रेडेशन हो सकता है.

समय के साथ कितनी कम हो जाती है एफिशिएंसी?

पहले साल के बाद हर साल 0.5-0.8 प्रतिशत डिग्रेडेशन होता है. इस कारण 10वें साल तक एफिशिएंसी में 5-8 प्रतिशत तक और 25वें साल तक 12-20 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिल सकती है. इसका मतलब है कि पैनल पहले साल जहां 99 प्रतिशत एफिशिएंसी के साथ काम करता है, वह 25वें साल तक कम होकर 80-87 प्रतिशत तक रह जाती है. रेगुलर मैंटेनेंस, सही अर्थिंग जैसी सावधानियां अपनाकर डिग्रेडेशन की स्पीड पर थोड़ी लगाम लगाई जा सकती है, लेकिन इसे पूरी तरह नहीं रोका जा सकता.

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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पढ़ाई पूरी करने के बाद पिछले एक दशक से मीडिया इंडस्ट्री में सक्रिय हूं. फिलहाल एबीपी न्यूज के साथ काम कर रहा हूं और यहां टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों, गैजेट्स, ऐप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और डिजिटल ट्रेंड्स पर लिख रहा हूं. फ्यूचर टेक, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया से जुड़े टॉपिक्स में विशेष रुचि है. पिछले 10 वर्षों में नेशनल, पॉलिटिक्स, इंटरनेशनल, ऑटो, बिजनेस और टेक समेत कई बीट्स पर काम करने का अनुभव रहा है. इस दौरान टाइम्स इंटरनेट, दैनिक जागरण और न्यूजबाइट्स जैसे कई मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. 

विभिन्न बीट्स पर काम करने के अनुभव ने खबरों को अलग-अलग नजरिए से समझने और पेश करने की समझ दी. रिपोर्टिंग और कंटेंट लिखने के दौरान हमेशा कोशिश रही कि खबरों को आसान और भरोसेमंद तरीके से रीडर तक पहुंचाया जाए. 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग करने और कई नेताओं के इंटरव्यू लेने का भी अवसर मिला. 

काम के सिलसिले में कई बड़े कार्यक्रमों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और विशेष आयोजनों को कवर करने का मौका मिला, जहां अलग-अलग पहलुओं को समझने का अवसर मिला. डिजिटल मीडिया के लगातार बदलते दौर में नई चीजें सीखने और खुद को अपडेट रखने की कोशिश रहती है, ताकि कंटेंट को बेहतर और रीडर के समझने के लिए आसान बनाया जा सके.

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