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NASA ने दिखाया कैसे बिना GPS के भी सैटेलाइट कर सकता है नेविगेट! जानें टेक्नोलॉजी

NASA ने ऐसी टेक्नोलॉजी दिखाई है जिससे सैटेलाइट GPS के बिना भी अंतरिक्ष में अपनी लोकेशन का पता लगा सकता है. जानिए यह नई नेविगेशन टेक्नोलॉजी कैसे काम करती है.

अंतरिक्ष में सैटेलाइट की सही कंडिशन पता करने के लिए GPS पर निर्भरता अब कम हो सकती है. NASA ने एक नए एक्सपेरिमेंट के जरिए दिखाया है कि सैटेलाइट अपने आसपास मौजूद दूसरी अंतरिक्ष चीजों को लैंडमार्क की तरह इस्तेमाल करके अपनी लोकेशन निर्धारित कर सकता है. ये टेक्नोलॉजी भविष्य के मून मिशन, डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन और कई सैटेलाइट वाले मिशनों के लिए अहम साबित हो सकती है.

Starling मिशन में हुआ नया एक्सपेरिमेंट

NASA के Starling मिशन ने अंतरिक्ष यान की ऑटोनॉमस नेविगेशन पावर में एक और जरूरी उपलब्धि हासिल की है. मिशन में FALCON यानी Fast Autonomous Lost-in-space Catalog-based Optical Navigation टेक्नोलॉजी का परीक्षण किया गया है.

बता दें कि ये टेक्नोलॉजी सैटेलाइट को अपनी कंडिशन जानने के लिए धरती से मिलने वाले नॉर्मल नेविगेशन सिग्नल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहने देती है. इसके बजाय अंतरिक्ष यान अपने कैमरों से आसपास मौजूद चीजों को देखता है और उनकी जानकारी को पहले से मौजूद स्पेस-ऑब्जेक्ट कैटलॉग से मिलाता है.

GPS सिग्नल नहीं मिला तो भी काम चलेगा

धरती के आसपास घूमने वाले कई सैटेलाइट GPS का इस्तेमाल नेविगेशन के लिए करते हैं. लेकिन जैसे-जैसे कोई मिशन चंद्रमा या उससे भी दूर जाता है, GPS सिग्नल की उपलब्धता और विश्वसनीयता कम हो जाती है.

यहीं FALCON जैसी टेक्नोलॉजी काफी कारगर साबित होती हैं. NASA और Stanford University से निकली कंपनी EraDrive ने मिलकर इस फ्लाइट एक्सपेरिमेंट को तैयार किया है. इसमें EraDrive का Era-Core फ्लाइट सॉफ्टवेयर और Starling के ऑनबोर्ड कैमरों को एक साथ इस्तेमाल किया गया. इसका मकसद सैटेलाइट को बिना लगातार ग्राउंड नेटवर्क पर निर्भर हुए अपनी कंडिशन समझने में सक्षम बनाना है.

अंतरिक्ष की दूसरी चीजें बनेंगी लैंडमार्क

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि FALCON ने Starling में लगे स्टार-ट्रैकर कैमरों का अलग तरीके से इस्तेमाल किया है. नॉर्मली इन कैमरों का काम अंतरिक्ष में चमकीले ऑब्जेक्ट्स को पहचानकर स्पेसक्राफ्ट की दिशा तय करने में मदद करना होता है.

लेकिन इस एक्सपेरिमेंट में कैमरों से दिखाई देने वाली दूसरी अंतरिक्ष चीजें, जैसे दूसरे स्पेसक्राफ्ट और ऑर्बिटल डेब्रिस, की पहचान की गई. इसके बाद इन चीजें का कंपैरिजन पहले से उपलब्ध ऑब्जेक्ट कैटलॉग से की गई.

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जब किसी चीज की पहचान पक्की हो गई तो FALCON ने उसे एक प्वाइंट के तौर पर इस्तेमाल किया. इसी जानकारी की मदद से Starling ने अपनी ऑर्बिट और कंडिशन का अंदाजा लगाया.

20 हजार अंतरिक्ष वस्तुओं का डेटा किया इस्तेमाल

एक्सपेरिमेंट के दौरान Starling में करीब 20,000 अंतरिक्ष चीजों और उनके ऑर्बिट का पूरा कैटलॉग लोड किया गया था. इसके बाद सैटेलाइट के कैमरों से मिले असली observation की तुलना कैटलॉग में मौजूद जानकारी से की गई.

इस प्रोसेस से सिर्फ Starling की कंडिशन ही नहीं बल्कि आसपास मौजूद दूसरी चीजों की ऑर्बिट्स का अंदाजा भी बेहतर किया गया. खास बात ये रही कि तीन दिनों के दौरान FALCON ने 200 से ज्यादा ऑब्जेक्ट्स की ऑर्बिट्स में सुधार किया और इसके लिए ग्राउंड ऑपरेटर के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ी.

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स्मार्टफोन, गैजेट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और इंटरनेट टेक्नोलॉजी की दुनिया में मेरा इंटरेस्ट काफी ज्यादा है. मैं यानी हिमांशु तिवारी, ABP LIVE में टेक और डिजिटल सेक्शन का हिस्सा हूं. मैं नई टेक्नोलॉजी को आसान और दिलचस्प अंदाज में पाठकों तक पहुंचाने का काम करता हूं. स्मार्टफोन लॉन्च, वायरल टेक ट्रेंड्स, AI अपडेट्स, सोशल मीडिया फीचर्स और साइबर फ्रॉड जैसे विषयों पर मेरी पकड़ मजबूत है.

टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों को सिर्फ जानकारी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें आम लोगों की जरूरत और रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर पेश करता हूं. खासतौर पर ऐसी खबरों पर काम करना पसंद करता हूं, जो लोगों के डिजिटल एक्सपीरियंस को सीधे प्रभावित करती हैं.

इसके अलावा मुझे नई टेक्नोलॉजी एक्सप्लोर करना, स्मार्टफोन फीचर्स को समझना और डिजिटल ट्रेंड्स पर रिसर्च करना पसंद है. मैं आसान भाषा और आकर्षक अंदाज में लिखने के लिए जाना जाता हूं, जिससे कठिन टेक्निकल बातें भी पाठकों के लिए समझना आसान हो जाती हैं. मैंने परास्नातक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की है.

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