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समुद्र की हजारों फीट गहराई में कैसे मिलता है सिग्नल! जानिए संपर्क साधने के लिए Submarines किस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं

Signal in Submarines: हमारे मोबाइल फोन और नॉर्मल संचार डिवाइस रेडियो तरंगों (Radio Waves) के जरिए काम करते हैं.

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  • सोनार तकनीक और भविष्य की लेजर आधारित संचार पर शोध जारी है।

Signal in Submarines: समुद्र की गहराइयों में मौजूद पनडुब्बियां (Submarines) आधुनिक सैन्य तकनीक का एक अहम हिस्सा हैं. ये पानी के भीतर हजारों फीट की गहराई तक जाकर लंबे समय तक काम कर सकती हैं. लेकिन एक बड़ा सवाल हमेशा लोगों के मन में आता है कि जब मोबाइल फोन का नेटवर्क जमीन पर भी कई बार कमजोर पड़ जाता है तो आखिर समुद्र की गहराई में मौजूद पनडुब्बियां अपने बेस या अन्य जहाजों से संपर्क कैसे बनाए रखती हैं? इसके पीछे बेहद दिलचस्प और एडवांस टेक्नोलॉजी काम करती है.

पानी के अंदर क्यों नहीं काम करते सामान्य रेडियो सिग्नल?

हमारे मोबाइल फोन और नॉर्मल संचार डिवाइस रेडियो तरंगों (Radio Waves) के जरिए काम करते हैं. लेकिन समुद्री पानी बिजली का अच्छा चालक होता है जिसके कारण उच्च आवृत्ति वाले रेडियो सिग्नल कुछ ही मीटर के भीतर कमजोर हो जाते हैं. यही वजह है कि समुद्र की गहराई में मोबाइल नेटवर्क या सामान्य वायरलेस संचार लगभग असंभव हो जाता है.

पनडुब्बियां कैसे भेजती और प्राप्त करती हैं संदेश?

पनडुब्बियों के लिए विशेष प्रकार की बेहद कम फ्रीक्वेंसी वाली तरंगों (Very Low Frequency - VLF) और बहुत कम फ्रीक्वेंसी वाली तरंगों (Extremely Low Frequency - ELF) का इस्तेमालल किया जाता है. इन तरंगों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये समुद्री पानी के भीतर काफी गहराई तक पहुंच सकती हैं.

हालांकि इनकी डेटा ट्रांसफर क्षमता बहुत कम होती है. इसका मतलब है कि इनके जरिए केवल छोटे मैसेज या ऑर्डर ही भेजे जा सकते हैं. बड़े डेटा, वीडियो या लंबी जानकारी भेजना संभव नहीं होता.

जब जरूरी हो तो सतह के करीब आती है पनडुब्बी

अगर किसी पनडुब्बी को बड़ी मात्रा में डेटा प्राप्त करना हो या विस्तृत संवाद करना हो तो उसे समुद्र की सतह के करीब आना पड़ता है. इस दौरान वह अपने विशेष एंटेना या संचार मस्तूल (Communication Mast) को बाहर निकालती है और फिर सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम से जुड़ती है. सैटेलाइट लिंक के जरिए पनडुब्बी अपने मुख्यालय, युद्धपोतों और अन्य सैन्य इकाइयों से तेज गति से डेटा का आदान-प्रदान कर सकती है.

साउंड वेव भी निभाती हैं अहम भूमिका

पानी के भीतर साउंड वेव रेडियो सिग्नल की तुलना में कहीं बेहतर तरीके से ट्रैवल करती हैं. इसी कारण पनडुब्बियां सोनार (SONAR) तकनीक का इस्तेमाल करती हैं. हालांकि सोनार मुख्य रूप से आसपास की वस्तुओं, जहाजों और बाधाओं का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में साउंड बेस्ड संचार तकनीक भी इस्तेमाल की जा सकती है.

भविष्य में और बेहतर होगी तकनीक

वैज्ञानिक लगातार ऐसी नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो समुद्र की गहराइयों में तेज और सुरक्षित संचार को संभव बना सकें. लेजर आधारित अंडरवॉटर कम्युनिकेशन और एडवांस ध्वनिक नेटवर्क जैसी तकनीकों पर शोध जारी है. आने वाले वर्षों में पनडुब्बियों का संचार पहले से कहीं अधिक तेज, सुरक्षित और प्रभावी हो सकता है.

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स्मार्टफोन, गैजेट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और इंटरनेट टेक्नोलॉजी की दुनिया में मेरा इंटरेस्ट काफी ज्यादा है. मैं यानी हिमांशु तिवारी, ABP LIVE में टेक और डिजिटल सेक्शन का हिस्सा हूं. मैं नई टेक्नोलॉजी को आसान और दिलचस्प अंदाज में पाठकों तक पहुंचाने का काम करता हूं. स्मार्टफोन लॉन्च, वायरल टेक ट्रेंड्स, AI अपडेट्स, सोशल मीडिया फीचर्स और साइबर फ्रॉड जैसे विषयों पर मेरी पकड़ मजबूत है.

टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों को सिर्फ जानकारी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें आम लोगों की जरूरत और रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर पेश करता हूं. खासतौर पर ऐसी खबरों पर काम करना पसंद करता हूं, जो लोगों के डिजिटल एक्सपीरियंस को सीधे प्रभावित करती हैं.

इसके अलावा मुझे नई टेक्नोलॉजी एक्सप्लोर करना, स्मार्टफोन फीचर्स को समझना और डिजिटल ट्रेंड्स पर रिसर्च करना पसंद है. मैं आसान भाषा और आकर्षक अंदाज में लिखने के लिए जाना जाता हूं, जिससे कठिन टेक्निकल बातें भी पाठकों के लिए समझना आसान हो जाती हैं. मैंने परास्नातक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की है.

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