इलेक्ट्रिक बसों को चार्ज करेगी सड़क, नहीं पड़ेगी केबल की जरूरत
अब इलेक्ट्रिक बसों को घंटों चार्जिंग पर खड़ा करने का झंझट खत्म होने वाला है. सड़क पर खड़ी-खड़ी बस हो जाएगी चार्ज. जानिए EV बसों के में बदलाव लाने वाली इस टेक्ना्ॅलाजी के बार में पूरी जानकारी.

देश के बड़े शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर बसें ईवी है. इलेक्ट्रिक बसों को चलाने के लिए बड़ी बैटरी लगती है. इसे चार्ज करने में समय और खर्च दोनों लगते हैं. अब स्विट्जरलैंड की ETH Zurich यूनिवर्सिटी से जुड़ी कंपनी Winduction ने एक अलग तरीका तैयार किया है. इसमें बस के खास टायर के जरिए सड़क पर लगी चार्जिंग प्लेट से बैटरी तक बिजली पहुंचती है. बस को चार्जिंग केबल से जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती.
हालांकि यह सिस्टम बस को सड़क पर दौड़ते समय चार्ज नहीं करता. बस जब स्टॉप पर रुकती है और उसका पहिया सड़क में लगी प्लेट के ऊपर आता है तभी चार्जिंग शुरू होती है. इस तरह बस अपने रोज के रूट पर छोटे-छोटे स्टॉप के दौरान बैटरी चार्ज कर सकती है. अभी यह तकनीक टेस्टिंग और प्रोटोटाइप के दौर में है. कंपनी का पहला पायलट 2028 में ज्यूरिख एयरपोर्ट के आसपास शुरू करने का प्लान है.
पहिए के जरिए बैटरी तक कैसे पहुंचेगी बिजली?
इस सिस्टम में बस स्टॉप की सड़क के अंदर एक चार्जिंग प्लेट लगाई जाती है. प्लेट में कॉइल होती हैं जो बिजली मिलने पर चुंबकीय ऊर्जा बनाती हैं. बस के खास टायर में भी कॉइल लगाई गई हैं. जब बस रुकती है और पहिया प्लेट के ऊपर आता है तो चुंबकीय ऊर्जा टायर की कॉइल तक पहुंचती है. वहां से बिजली बस की बैटरी में जाती है. इस पूरे प्रोसेस में केबल लगाने की जरूरत नहीं होती.
कंपनी ने टायर को इस सिस्टम का जरूरी हिस्सा इसलिए बनाया क्योंकि बस का पहिया ही सड़क के सबसे करीब रहता है. आम वायरलेस चार्जिंग सिस्टम में सड़क के नीचे लगी कॉइल से बस के निचले हिस्से में लगी कॉइल तक बिजली पहुंचती है. दोनों के बीच ज्यादा दूरी होने पर ऊर्जा का नुकसान बढ़ सकता है. पहिए के अंदर कॉइल लगाने से यह दूरी कम हो जाती है. Winduction का दावा है कि उसके प्रोटोटाइप में प्लेट से बस की बैटरी तक बिजली पहुंचाने की कैपेसिटी 90 फीसदी से ज्यादा रही.

छोटी बैटरी से भी चल जाएगी बस
अभी कई इलेक्ट्रिक बसें रात में डिपो पर खड़ी करके चार्ज की जाती हैं. इसके लिए बड़ी बैटरी और ज्यादा पावर वाले चार्जर की जरूरत होती है. बड़ी बैटरी बस का वजन बढ़ाती है और यात्रियों के लिए उपलब्ध जगह भी कम कर सकती है. अगर बस दिन में अपने रूट पर रुकते समय थोड़ी-थोड़ी चार्ज होती रहे तो उसे उतनी बड़ी बैटरी की जरूरत नहीं पड़ेगी. इससे बस खरीदने और चलाने का खर्च कम हो सकता है. चार्जिंग प्लेट हर स्टॉप पर लगाने की भी जरूरत नहीं होगी.
Winduction के ज्यूरिख एयरपोर्ट से ओर्लिकॉन तक के रूट के अनुमान में 24 में से सिर्फ दो स्टॉप पर प्लेट लगाने की बात कही गई है. कंपनी की कैलकुलेशन के मुताबिक 16 घंटे के ऑपरेशन के दौरान बसें इन प्लेटों पर कुल करीब तीन घंटे चार्ज होंगी. छोटी बैटरी वाली बस ज्यादा यात्रियों को ले जा सकती है और रात में एक साथ कई बसों की चार्जिंग से बिजली ग्रिड पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो सकता है.

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आम बसों में आने में लगेगा समय
इस तकनीक को बाजार में लाने से पहले कई टेस्ट पूरे करने होंगे. आम बस के टायर में स्टील की परतें होती हैं. कंपनी के मुताबिक यह परतें चुंबकीय ऊर्जा से रिएक्ट कर सकती हैं और बिजली को बैटरी तक पहुंचाने के बजाय गर्मी में बदल सकती हैं. इसलिए Winduction पार्टनर्स के साथ खास स्टील-फ्री टायर बना रही है. इसके बाद सिस्टम को बस, चार्जिंग प्लेट और रोज के रूट पर लंबे समय तक टेस्ट करना होगा.
फिलहाल कंपनी स्विट्जरलैंड के विंटरथुर में टेस्ट लैब और बस स्टॉप तैयार कर रही है. उसका पहला पायलट 2028 में ज्यूरिख एयरपोर्ट के आसपास शुरू करने का टारगेट है. वहां बस को असली रूट पर चलाकर यात्रियों के साथ भी टेस्ट किया जा सकता है. अगर सिस्टम भरोसेमंद और किफायती साबित हुआ तो बसों को रातभर डिपो में चार्ज करने पर जरूरत काफी हद तक कम हो सकती है.
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