बैंक खातों पर AI साइबर अटैक का खतरा! 4 साल में दोगुने हुए हमले, पढ़ें डराने वाली रिपोर्ट
भारत में बैंक खातों और UPI पर AI साइबर हमलों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. CERT-In की नई डिजिटल थ्रेट रिपोर्ट के अनुसार, चार साल में साइबर हमले दोगुने हुए हैं. जानें बचाव के तरीके.

अगर आपको लगता है कि बैंक में रखा आपका पैसा पूरी तरह सुरक्षित है तो भारत सरकार की यह रिपोर्ट आपकी चिंता बढ़ा सकती है. देश की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In, CSIRT-Fin और साइबर सिक्योरिटी कंपनी SISA की ओर से जारी Digital Threat Report 2025-26 में बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और इंश्योरेंस (BFSI) सेक्टर पर मंडरा रहे साइबर खतरों की गंभीर तस्वीर सामने आई है. रिपोर्ट बताती है कि अब साइबर अपराध पहले से कहीं ज्यादा तेज ,ज्यादा स्मार्ट और AI की वजह से ज्यादा खतरनाक हो चुके हैं.
4 साल में दोगुने से ज्यादा हुए साइबर हमले
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साइबर हमलों की रफ्तार दुनिया के औसत से करीब 1.6 गुना ज्यादा है. साल 2021 में करीब 14 लाख साइबर घटनाएं दर्ज हुई थीं. वहीं, 2025 तक यह आंकड़ा 29 लाख से ज्यादा पहुंच गया. इसका मतलब यह है कि सिर्फ चार साल में साइबर अटैक दोगुने से भी ज्यादा हो गए. सबसे ज्यादा निशाने पर बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर है.
अब इंसान नहीं, AI कर रहा साइबर हमला
रिपोर्ट का सबसे बड़ा खुलासा यह है कि अब साइबर हमले सिर्फ इंसानों के भरोसे नहीं हो रहे बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस खुद हमलों का बड़ा हिस्सा संभाल रहा है. नवंबर 2025 में दुनिया का पहला ऐसा साइबर जासूसी अभियान सामने आया, जिसमें 80 से 90 फीसदी काम AI ने खुद किया. इस हमले में करीब 30 बड़े संस्थानों को निशाना बनाया गया, जिनमें कई फाइनेंशियल कंपनियां भी शामिल थीं.
AI कुछ ही सेकंड में हजारों रिक्वेस्ट भेजकर सिस्टम की कमजोरियां खोज सकता है. रिपोर्ट कहती है कि जिस काम में पहले एक्सपर्ट हैकर्स की टीम को कई हफ्ते लगते थे, वह काम अब AI कुछ मिनटों में कर देता है. इसका मतलब यह है कि अब छोटे साइबर अपराधी भी AI की मदद से बड़े बैंकों को निशाना बना सकते हैं.

डीपफेक बन गया हैकर्स का नया हथियार
रिपोर्ट के मुताबिक, डीपफेक अब सिर्फ मनोरंजन का टूल नहीं, बल्कि साइबर अपराध का बड़ा हथियार बन चुका है. हैकर्स बड़े अधिकारियों की आवाज और चेहरा हूबहू कॉपी करके नकली वीडियो कॉल कर रहे हैं और करोड़ों रुपये ट्रांसफर करवा रहे हैं. भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में ऐसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है. इतना ही नहीं, नकली पहचान और फर्जी दस्तावेज बनाकर बैंकों की KYC प्रक्रिया तक को धोखा दिया जा रहा है. खास तौर पर वीडियो KYC और ऑनलाइन अकाउंट ओपनिंग सिस्टम सबसे ज्यादा निशाने पर हैं.
AI की वजह से फिशिंग ईमेल पहचानना मुश्किल
रिपोर्ट कहती है कि अब फिशिंग ईमेल और मैसेज पहचानना पहले जितना आसान नहीं रहा. AI ऐसे ईमेल और मैसेज तैयार कर रहा है, जिनमें न भाषा की गलती होती है और न कोई शक पैदा करने वाली बात. एक साथ लाखों लोगों तक ऐसे मैसेज पहुंचाए जा रहे हैं, जिससे धोखाधड़ी का खतरा कई गुना बढ़ गया है.
UPI और मोबाइल बैंकिंग पर भी बढ़ा खतरा
रिपोर्ट में UPI और मोबाइल बैंकिंग फ्रॉड को सबसे गंभीर खतरों में शामिल किया गया है. हैकर्स OTP सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाकर एक साथ कई ट्रांजैक्शन भेजते हैं और सिस्टम को भ्रमित कर देते हैं. दरअसल, UPI पेमेंट रियल टाइम में पूरा हो जाता है, इसलिए कई बार फ्रॉड का पता चलने तक पैसा निकल चुका होता है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई मामलों में कंपनियों को हफ्तों या महीनों बाद पता चलता है कि उनके साथ साइबर फ्रॉड हो चुका है.
डेटा चोरी पकड़ने में लग जाते हैं 263 दिन
रिपोर्ट का एक और चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है. किसी डेटा चोरी का पता लगाने और उसे रोकने में औसतन 263 दिन लग जाते हैं. इसका मतलब यह है कि करीब 9 महीने तक हैकर किसी सिस्टम के अंदर मौजूद रह सकता है और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगती. दूसरी तरफ जैसे ही किसी सॉफ्टवेयर की कमजोरी सामने आती है तो हैकर्स कुछ ही घंटों में उसका फायदा उठाकर हमला कर देते हैं.
कागजों पर सुरक्षित, लेकिन असली हमले में फेल
रिपोर्ट ने साइबर सुरक्षा की बड़ी हकीकत भी उजागर की है. कई बैंक और कंपनियां सभी जरूरी ऑडिट और सिक्योरिटी सर्टिफिकेट हासिल कर लेती हैं, लेकिन असली साइबर हमले के समय वही सिस्टम फेल हो जाते हैं. रिपोर्ट इसे Compliance और Real Security के बीच का Gap बताती है. कई मामलों में तो कंपनियों को अपने सिस्टम में सेंध लगने का पता खुद नहीं चला, बल्कि बाहरी एजेंसियों ने इसकी जानकारी दी.
एक वेंडर हैक तो मुश्किल में 70 बैंक
रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में Supply Chain Attack सबसे बड़ा साइबर खतरा बन सकता है. दरअसल, 2025 में एक ही वेंडर के हैक होने से अमेरिका के 70 से ज्यादा बैंक और क्रेडिट यूनियन प्रभावित हुए और 10 लाख से ज्यादा ग्राहकों का डेटा खतरे में पड़ गया. इसके बाद अप्रैल 2026 में दो बड़े अमेरिकी बैंकों का डेटा एक साथ रैंसमवेयर वेबसाइट पर पहुंच गया, क्योंकि दोनों एक ही टेक्नोलॉजी वेंडर का इस्तेमाल कर रहे थे. इसका मतलब यह है कि अब सिर्फ बैंक का सुरक्षित होना काफी नहीं है. अगर उसका कोई टेक्नोलॉजी पार्टनर कमजोर है तो पूरा सिस्टम खतरे में आ सकता है.
'आज चुराओ, कल पढ़ो' वाली नई चाल
रिपोर्ट में क्वांटम कंप्यूटिंग से जुड़े भविष्य के खतरे को लेकर भी चेतावनी दी गई है. हैकर्स अभी से एन्क्रिप्टेड डेटा चुराकर स्टोर कर रहे हैं. फिलहाल वे इस डेटा को पढ़ नहीं सकते, लेकिन जब भविष्य में शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर उपलब्ध होंगे, तब यही डेटा आसानी से डिक्रिप्ट किया जा सकेगा. इसी रणनीति को 'Harvest Now, Decrypt Later. कहा जा रहा है. दरअसल, बैंकों का डेटा कई वर्षों तक सुरक्षित रखा जाता है, इसलिए यह खतरा बैंकिंग सेक्टर के लिए सबसे गंभीर माना जा रहा है.
सरकार और RBI के लिए क्या सुझाव?
रिपोर्ट में सरकार, RBI और दूसरे रेगुलेटर्स के लिए कई अहम सुझाव दिए गए हैं. डिजिटल ऑनबोर्डिंग के दौरान Liveness Detection अनिवार्य किया जाएं, ताकि डीपफेक के जरिए फर्जी अकाउंट न खुल सकें. AI सिस्टम के इस्तेमाल से पहले हैकर की तरह टेस्ट किया जाए. बड़े वित्तीय फैसलों में इंसानी मंजूरी जरूरी हो. साल में सिर्फ एक बार ऑडिट करने की बजाय लगातार निगरानी की व्यवस्था बनाई जाए. इसके अलावा अगले 18 महीनों का रोडमैप भी सुझाया गया है जिसमें Phishing-proof Multi-Factor Authentication (MFA) लागू करने से लेकर Quantum-proof Encryption की तैयारी तक शामिल है.
आम आदमी के लिए क्या मतलब?
इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि साइबर खतरा अब सिर्फ बैंकों या बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रह गया है. आपका UPI, मोबाइल बैंकिंग ऐप, वीडियो KYC, ऑनलाइन बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट सब हैकर्स के निशाने पर हैं. रिपोर्ट साफ कहती है कि पूरा वित्तीय सिस्टम भरोसे पर चलता है और साइबर अपराधी अब इसी भरोसे को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में किसी भी अनजान लिंक, QR कोड, OTP, संदिग्ध मैसेज या वीडियो कॉल पर आंख बंद करके भरोसा करना भारी पड़ सकता है. थोड़ी-सी सावधानी ही आपके बैंक खाते और मेहनत की कमाई को सुरक्षित रख सकती है.
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