उत्तराखंड में फिर जीवित हुई अनोखी जोजोड़ा परंपरा, दुल्हन खुद बारात लेकर पहुंची दूल्हे के घर
Uttarakhand News: दूल्हे पक्ष ने भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बारातियों का स्वागत किया. स्थानीय लोग इसे सामाजिक समानता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक मान रहे हैं.

उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के आराकोट क्षेत्र में रविवार की रात एक ऐसी शादी हुई जिसने न केवल स्थानीय लोगों को, बल्कि बाहर से आए मेहमानों को भी पारंपरिक संस्कृति से रूबरू करा दिया. बंगाण क्षेत्र के कलीच गांव में पूर्व प्रधान कल्याण सिंह चौहान के पुत्र मनोज की शादी ग्राम जाकटा निवासी जनक सिंह की पुत्री कविता से हुई, लेकिन इस विवाह की खासियत यह रही कि दुल्हन स्वयं अपने परिजनों और ढोल-नगाड़ों के साथ बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंची.
ऐसे विवाह को यहां की बोली में ‘जोजोड़ा’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो जोड़ा भगवान खुद बनाते हैं. इस परंपरा में दुल्हन पक्ष बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंचता है और पूरे रीति-रिवाज के साथ विवाह संपन्न होता है. बारातियों को ‘जोजोड़िये’ कहा जाता है, इस रस्म का उद्देश्य बेटियों के पिता पर आर्थिक बोझ कम करना था, लेकिन यह प्रथा समय के साथ धीरे-धीरे लुप्त हो गई थी. बंगाण क्षेत्र में करीब पांच दशक पहले यानी 1970 के बाद से ऐसी शादियां बंद हो गई थीं.
पारंपरिक रीति-रिवाजों में भी आया बदलाव
इतिहासकार प्रयाग जोशी जिन्होंने ‘रवाई से उत्तराखंड’ नामक किताब लिखी है, बताते हैं कि 1970 के दशक में जब क्षेत्र आर्थिक रूप से बदलने लगा और समाज में नए प्रभाव आए, तब पारंपरिक रीति-रिवाजों में भी बदलाव आया. धीरे-धीरे ‘जोजोड़ा’ जैसी लोकसंस्कृति विलुप्त हो गई, अब कई सालों बाद इस परंपरा को फिर से जीवित करने का साहस कलीच गांव के कल्याण सिंह चौहान ने दिखाया.
कल्याण सिंह जो क्षेत्र में उन्नतिशील किसान और सामाजिक चिंतक के रूप में जाने जाते हैं. कहते हैं हमें अपनी संस्कृति को बचाना है तो पुराने रीति-रिवाजों को जिंदा करना होगा उन्होंने अपने बेटे की शादी में दहेज रहित और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी इस पहल को आगे बढ़ाया. इस विवाह में दोनों पक्षों की ओर से न तो दहेज मांगा गया और न ही किसी प्रकार की भौतिक मांग रखी गई.
पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बारातियों का स्वागत
रविवार की रात जब दुल्हन कविता अपने परिजनों के साथ ढोल-दमाऊं की थाप पर बारात लेकर कलीच पहुंची तो पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल था. दूल्हे पक्ष ने भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बारातियों का स्वागत किया. स्थानीय लोग इसे सामाजिक समानता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक मान रहे हैं. अब बाराती सोमवार को अपने गांव लौट जाएंगे, जबकि दुल्हन कविता अपने ससुराल में ही रहेगी. इस अनोखी शादी ने एक बार फिर दिखा दिया कि आधुनिकता के दौर में भी परंपराएं जिंदा रह सकती हैं, यदि समाज उन्हें सहेजने की ठान ले.
Source: IOCL


























