दुनिया की सबसे पुरानी भाषा कौन-सी, जानें जावेद अख्तर से जुड़े इस सवाल का जवाब?
जावेद अख्तर अपनी बेबाक राय और तर्कपूर्ण बातों के लिए जाने जाते हैं. चाहे समाज हो, राजनीति हो या भाषा और संस्कृति वह हर विषय पर खुलकर अपनी बात रखते हैं.

भाषा सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं होती, बल्कि यह हमारी सोच, संस्कृति और इतिहास को भी अपने साथ लेकर चलती है. भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में भाषा को लेकर बहस और जिज्ञासा हमेशा बनी रहती है. कभी हिंदी–उर्दू को लेकर चर्चा होती है, तो कभी संस्कृत और तमिल जैसी प्राचीन भाषाओं को लेकर सवाल उठते हैं. हाल ही में ऐसी ही एक दिलचस्प और सोचने पर मजबूर करने वाली बातचीत देखने को मिली, जब मशहूर गीतकार, कवि और लेखक जावेद अख्तर ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में भाषाओं, धर्मनिरपेक्षता, परिवार और अपने निजी जीवन से जुड़े अनुभव खुलकर साझा किए.
जावेद अख्तर अपनी बेबाक राय और तर्कपूर्ण बातों के लिए जाने जाते हैं. चाहे समाज हो, राजनीति हो या भाषा और संस्कृति वह हर विषय पर खुलकर अपनी बात रखते हैं. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 के एक सत्र में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जब दर्शकों ने उनसे सीधे और तीखे सवाल पूछे और उन्होंने भी उतनी ही सादगी और स्पष्टता से जवाब दिए.
दुनिया की सबसे पुरानी भाषा कौन-सी
फेस्टिवल के दौरान एक दर्शक ने जावेद अख्तर से सवाल किया कि उर्दू और संस्कृत में से कौन-सी भाषा ज्यादा पुरानी है. इस सवाल पर जावेद अख्तर पहले तो थोड़ा हैरान हुए और फिर मुस्कराते हुए बोले, यह कैसा सवाल है. संस्कृत हजारों साल पुरानी भाषा है, जबकि उर्दू तो अभी हजार साल भी पूरी नहीं हुई है. उन्होंने आसान शब्दों में समझाते हुए कहा कि संस्कृत दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी जीवित भाषा मानी जाती है, जबकि तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा कहा जाता है.
जावेद अख्तर के मुताबिक, उर्दू इन दोनों के मुकाबले काफी नई भाषा है. उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि उर्दू तो कल की बच्ची है. हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी भाषा की अहमियत सिर्फ उसकी उम्र से नहीं तय की जानी चाहिए. भाषा का असली मूल्य उसके साहित्य, उसकी अभिव्यक्ति की ताकत और समाज में उसके योगदान से होता है. उन्होंने उर्दू को संस्कृत की छोटी बहन बताया और कहा कि उर्दू ने संस्कृत सहित कई भाषाओं से प्रभाव लेकर खुद को समृद्ध किया है.
भाषा और धर्म का कोई रिश्ता नहीं
जावेद अख्तर ने इस मौके पर एक बहुत जरूरी बात भी कही, उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भाषा का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता. उनके अनुसार भाषा क्षेत्र से जुड़ी होती है, धर्म से नहीं, उर्दू को सिर्फ एक समुदाय की भाषा मानना गलत है. यह भारत की साझा विरासत है, जिस पर हर भारतीय का उतना ही हक है. उन्होंने कहा कि भाषाओं को लड़ाई का कारण बनाने के बजाय उन्हें लोगों को जोड़ने का जरिया बनाना चाहिए. भाषा पुल बनाती है, दीवार नहीं.
मां और दादी की यादों में हुए भावुक
इस सत्र के दौरान जावेद अख्तर भावुक भी हो गए. उन्होंने अपने बचपन की बातें साझा करते हुए बताया कि जब वह सिर्फ आठ साल के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया था. उन्होंने कहा कि उनकी मां ने ही भाषा को उनके लिए एक रोचक और आनंददायक अनुभव बनाया. जावेद अख्तर ने बताया, मेरी मां मुझे नए शब्द सिखाती थीं, उनके अर्थ समझाती थीं. आज भी जब मैं कुछ लिखता हूं, तो मेरे दिमाग में वही बातें आती हैं, जो मैंने छह–सात साल की उम्र में उनसे सीखी थीं. उन्होंने अपनी दादी का भी जिक्र किया और बताया कि वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनमें जीवन और समाज को समझने की गहरी समझ थी. धर्मनिरपेक्षता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह कोई किताब पढ़कर या भाषण सुनकर नहीं सीखी जा सकती, बल्कि यह परिवार और आसपास के माहौल से आती है.
युवाओं को दी खास सलाह
फेस्टिवल में मौजूद एक युवा ने जब तुलना और प्रतिस्पर्धा को लेकर अपनी परेशानी बताई, तो जावेद अख्तर ने उसे जीवन का एक सरल लेकिन गहरा मंत्र दिया. उन्होंने कहा, दूसरों से तुलना करने से डर पैदा होता है. हमेशा कोई आपसे बेहतर होगा और आप किसी और से बेहतर होंगे. इसलिए असली मुकाबला खुद से होना चाहिए.
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Source: IOCL


























