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उत्तराखंड: कार्य आवंटन को लेकर लगातार चर्चा में वन विभाग, बिना पोस्टिंग पर खड़े हुए सवाल

Uttarakhand News: वन विभाग में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कार्यभार (चार्ज) आवंटन को लेकर आईएफएस और आईएएस अधिकारियों के बीच विभागीय जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण को लेकर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं.

उत्तराखंड वन विभाग में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कार्यभार (चार्ज) आवंटन को लेकर प्रशासनिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं. मामला आईएफएस और आईएएस अधिकारियों के बीच विभागीय जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण से जुड़ा है, जिसमें शासन की भूमिका को लेकर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं.

अधिकारी बीपी गुप्ता के रिटायर्ड के बाद मीनाक्षी को सौंपा गया उनका प्रभार

कुछ दिन पहले प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ स्तर) के अधिकारी बीपी गुप्ता के रिटायर्ड होने के बाद उनका प्रभार आईएफएस अधिकारी मीनाक्षी को सौंपा गया था. शासन स्तर से जारी आदेश के तहत उन्हें कानूनी और एचआरडी (मानव संसाधन विकास) प्रकोष्ठ का अतिरिक्त दायित्व भी दिया गया था. यह आदेश विधिवत शासन से निर्गत हुआ था, जिससे यह स्पष्ट था कि उक्त चार्ज शासन की स्वीकृति से प्रदान किए गए हैं.

हालांकि, हाल ही में आईएएस अधिकारी सुरेंद्र मेहरा की वापसी के बाद बीपी गुप्ता के स्थान पर संबंधित प्रभार उन्हें सौंप दिया गया. चर्चा इस बात को लेकर है कि यह कार्यभार परिवर्तन सीधे वन मुख्यालय स्तर से किया गया, जबकि इस संबंध में शासन से कोई पृथक औपचारिक आदेश जारी नहीं हुआ. इतना ही नहीं, लीगल विभाग का दायित्व भी सुरेंद्र मेहरा को सौंपे जाने की बात सामने आई है, जबकि यह प्रभार पूर्व में शासनादेश के माध्यम से मीनाक्षी को आवंटित किया गया था.

राज्य शासन के पास होता है अधिकारियों के विभाजन का निर्णय

प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि ऑल इंडिया सर्विस (एआईएस) अधिकारियों के कार्य विभाजन और प्रभार निर्धारण का अंतिम अधिकार राज्य शासन के पास होता है. ऐसे में यदि किसी अधिकारी को दिया गया दायित्व बदला जाता है तो उसके लिए शासन स्तर से संशोधित आदेश अपेक्षित होता है. विभागीय स्तर पर प्रभार परिवर्तन की प्रक्रिया को लेकर अब पारदर्शिता और वैधानिकता पर सवाल उठ रहे हैं.

वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि यह आंतरिक प्रशासनिक पुनर्संरचना का हिस्सा हो सकता है, जबकि अन्य हलकों में इसे प्रक्रिया से इतर कदम बताया जा रहा है. फिलहाल इस मामले में आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है. इस घटनाक्रम ने एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है कि क्या विभागीय प्रमुख स्तर पर लिए गए निर्णय शासनादेश से ऊपर हो सकते हैं, या फिर प्रत्येक प्रभार परिवर्तन के लिए शासन की विधिवत स्वीकृति अनिवार्य है.

वहीं इस विषय के फॉरेस्ट प्रिंसिपल, सेकेट्री आर के सुधांशु ने बताया कि 3 महीने के लिए हॉफ के द्वारा चार्ज दिया जा सकता है, लेकिन इसके बाद शाना की निर्णय लेगा. इस प्रकार के फैसले से कई चर्चाएं सामने आ रही है कि क्या इस प्रकार के फैसले लिए जाने ठीक है? क्या ये माप दंड हर अधिकारी के लिए अलग होता है या केवल खास के लिए ही ऐसे फैसले लिए जाते है.

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