विनोद तावड़े को प्रभारी बनाकर BJP ने 2024 की गलती सुधारी? OBC चेहरे पर इसलिए लगाया दांव!
भारतीय जनता पार्टी ने साल 2027 में विधानसभा चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश का प्रभारी विनोद तावड़े को बनाया है. उनके जरिए बीजेपी साल 2024 की गलती सुधारती दिख रही है.

भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को प्रभारी नियुक्त किया है. उनके साथ सह प्रभारी का जिम्मा जगदीश पटेल को दी गई है. इन नियुक्तियों के जरिए बीजेपी ने साल 2024 में की गई गलतियों को सुधारने की कोशिश की है.
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राज्य में वर्ष 2024 के चुनाव में बीजेपी से ओबीसी मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग छिटका. इसके पीछे वजह यह रही कि बीजेपी अपने जातीय समीकरण को सेट नहीं कर पाई.
एक अनुमान के अनुसार राज्य में 100 से अधिक सीटें ओबीसी वर्ग और उसमें भी कुर्मी बाहुल्य सीटें हैं. बीजेपी एक हद तक कुर्मी मतों को अपना दल सोने लाल पटेल की नेता और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल के जरिए साधने की कोशिश करती है. तावड़े को प्रभारी बनाने के जरिए बीजेपी ने अब अपने दम पर कुर्मी मतों को साथ लाने की कोशिश की है.
यूपी के 75 जिलों में से जिन 26 जिलों को कुर्मी बहुल माना जाता है. उसमें वाराणसी, प्रयागराज, कौशांबी, प्रतापगढ़, बांदा, चित्रकूट, मिर्जापुर, सोनभद्र, चंदौली,बाराबंकी, फर्रुखाबाद, लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, सीतापुर, भदोही , कानपुर देहात, कानपुर नगर, उन्नाव, बरेली, बस्ती, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, गोंडा, अयोध्या, अंबेडकरनगर शामिल है.
साल 2019, 2022, 2024 के चुनाव परिणाम क्या थे?
साल 2022 के चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो बीजेपी उन कुर्मी बहुल सीटों पर चुनाव हार गई जहां वर्ष 2017 के चुनाव में वह जीती थी. जिन जिलों में कुर्मी बहुल सीटें हैं उसमें सपा- चंदौली 1, भदोही 1, प्रयागराज 4, कौशांबी 3, प्रतापगढ़ 2, बांदा 1, चित्रकूट 1, कानपुर नगर 3, बरेली 2, बाराबंकी 3, बहराइच 1, श्रावस्ती 1, सीतापुर 1, बस्ती 3, डुमरियागंज 1, अयोध्या 2, अंबेडकरनगर में 5 सीटें जीती थी. यानी कुल 35 सीटों पर सपा ने जीत हासिल की थी.
वहीं बीजेपी ने इन्हीं जिलों की 95 सीटों पर जीत हासिल की थी. यूं तो सपा और बीजेपी के बीच आंकड़ों का अंतर बड़ा है लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 में पासा पलटता दिखाई दिया.
इन्हीं 26 जिलों की 30 लोकसभा सीटों में से 16 पर बीजेपी और 14 लोकसभा सीटों पर सपा-कांग्रेस अलायंस ने जीत हासिल की. 2019 के चुनाव में इन्हीं सीटों पर बीजेपी अलायंस 28, सपा-बसपा अलायंस 2 (बसपा के खाते में) सीटें जीती थी.
इन आंकड़ों को ध्यान में रखें तो यह स्पष्ट है साल 2024 के चुनाव में कुर्मी मतदाता बड़े स्तर पर सपा-कांग्रेस के अलायंस से साथ गए. एक अनुमान के अनुसार राज्य में 8 फीसदी के करीब कुर्मी मतदाता हैं. ऐसे में बीजेपी इन 8 फीसदी मतदाताओं को अपने साथ लाने की पूरी कोशिश कर रही है.
2024 में टूटे समीकरण?
तावड़े को यूपी की जिम्मेदारी देने पर वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला ने कहा कि बीजेपी अपनी जातीय केमेस्ट्री को दुरुस्त करना चाहती है. साल 2014 के चुनाव के बाद से ही बीजेपी के बारे में यह माना जा रहा था कि जातियों की जो केमेस्ट्री उनसे बनाई है वह उसके लिहाज से बहुत शानदार है लेकिन 2024 के इलेक्शन में समीकरण टूट गए.
उन्होंने कहा कि यह बिल्कुल स्पष्ट है कि बीजेपी को यह समझ आ गया है कि 2024 के नतीजों में उसे नुकसान हुआ. बीजेपी का अपना आंतरिक संघर्ष एक बड़ा मुद्दा था, वहीं अखिलेश यादव का PDA भी प्रभावी मुद्दा रहा. सबसे बड़ी बात यह रही कि बीजेपी की जातीय केमिस्ट्री बिगड़ गई थी. अब बीजेपी उस डैमेज को ठीक करने की कोशिश कर रही है और इसी कड़ी में विनोद तावड़े को जिम्मेदारी दी गई है.
'बीजेपी काफी सतर्क'
शुक्ला के अनुसार साल 2024 के बाद बीजेपी काफी सतर्क है और फूंक-फूंककर कदम रख रही है, ताकि जातीय समीकरणों की जो कील-कांट ढीली हुई है, उसे दोबारा दुरुस्त किया जा सके. ओबीसी चेहरे के तौर पर बीजेपी ने रेखा वर्मा को भी मौका दिया है. तावड़े के जरिए संगठन को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है. तावड़े ने खुद को साबित किया है और संगठन के काम में उनकी क्षमता सामने आई है. उनकी सांगठनिक क्षमता और जातीय समीकरण, दोनों बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हैं.
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले जातीय केमिस्ट्री का बेहतर होना बेहद जरूरी है. बीजेपी को उम्मीद है कि विनोद तावड़े की सांगठनिक क्षमता और उनकी जातीय पृष्ठभूमि का लाभ पार्टी को मिलेगा. खासकर अगर कुर्मी बिरादरी के छिटकने की बात आती है, तो उन्हें रोकने में भी तावड़े की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.























