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सीएम पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र में दांव पर है गन्ना मंत्री यतीश्वरानंद की साख, जानें- वजह

गन्ना मंत्री यतीश्वरानंद के सामने अपनी साख बचाने के साथ ही मुख्यमंत्री को चुनाव में फायदा पहुंचाने की चुनौती भी है. उधम सिंह नगर जिले के किसानों में पहले ही बहुत नाराजगी है.   

Uttarakhand politics: कब किसकी साख कैसे कहां दांव पर लग जाए कोई नहीं बता सकता. खासतौर पर राजनीति के क्षेत्र में तो अक्सर ऐसा ही होता रहता है. अब उत्तराखंड में ही देखिए, गन्ना मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद की साख मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र में दांव पर लग गई है. उधम सिंह नगर जिले की सितारगंज स्थित सहकारी चीनी मिल पिछले चार साल से बंद है और मुख्यमंत्री के जिले के किसान बरेली की बहेड़ी चीनी मिल को गन्ना बेचने को मजबूर है. 

किसानों का आक्रोश चुनाव में झलक सकता है
चार साल से बंद पड़ी इस चीनी मिल को डेढ़ साल से पीपीपी मोड में दिए जाने की प्रक्रिया खत्म होने का नाम नहीं ले रही है और अब यदि प्रक्रिया खत्म भी हो जाए तो विधानसभा चुनाव से पहले पेराई सत्र शुरू होना सम्भव नजर नहीं आ रहा है, और यदि पेराई सत्र शुरू नहीं होती है तो मुख्यमंत्री की विधानसभा खटीमा के साथ ही नानकमत्ता और सितारगंज विधानसभा क्षेत्र के किसानों का आक्रोश चुनाव में झलक सकता है.

कृषि कानूनों के खिलाफ है नाराजगी 
अगर ऐसा होता है तो इसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी गन्ना मंत्री की होगी जो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गहरे मित्र भी हैं. इसलिए, गन्ना मंत्री के सामने अपनी साख बचाने के साथ ही मुख्यमंत्री को चुनाव में फायदा पहुंचाने की चुनौती भी है. वैसे भी केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ उधम सिंह नगर जिले के किसानों में पहले ही बहुत नाराजगी है.   

बेहद धीमी रही गति
5 नवम्बर 2019 को सितारगंज सहकारी चीनी मिल को पीपीपी मोड में चलाने का फैसला त्रिवेंद्र की कैबिनेट से मंजूर हुआ. वित्त और तमाम तकनीकी झंझावातों के चलते प्रक्रिया की गति कछुए से भी कम हो गई थी. विलम्ब होते होते सत्ता परिवर्तन हो गया और तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बन गए. 25 जून 2021 को एक बार फिर मंत्रिमंडल की बैठक में इस विषय को मंजूरी दी गई. ये तय हुआ कि पूरी जमीन (52.94 एकड़) के साथ चीनी मिल को 30 साल की लीज पर दे दिया जाए. प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए 1 जून 2021 को टेंडर निकाला गया. जमीन के मामले में संशोधन करते हुए टेंडर की अवधि 14 जुलाई कर दी गई और राजनीतिक दखल के चलते अवधि 26 जून तक बढ़ा दी गई. 

प्रक्रिया से खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है
चूंकि निवेशक पहले सत्ता परिवर्तन के बाद से पशोपेश में थे और इसी अवधि को एक बार फिर राजनीतिक दखल के चलते बढाकर 6 अगस्त कर दिया गया. किसी के पास इस बात का जवाब नहीं है कि बार-बार एक ऐसी प्रक्रिया से खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है जिससे तीन विधानसभा क्षेत्रों खटीमा, नानकमत्ता और सितारगंज के लाखों किसानों का भविष्य जुड़ा है. किसानों का ही नहीं इन तीनों विधानसभा से भाजपा के विधायकों की राजनीति भी जुड़ी है और जिनमें एक खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी हैं. आखिर इस टेंडर में कौन छेड़छाड़ करके जबरदस्ती पश्चिमी यूपी की एक कंपनी को घुसाना चाहता है. 

बरेली में गन्ना बेचते हैं मुख्यमंत्री के जिले के किसान 
इस चीनी मिल को त्रिवेंद्र सरकार में 5 दिसम्बर 2017 को इसलिए बंद कर दिया गया क्योंकि कई महिनों से बगैर वेतन के काम कर रहे कर्मचारी धरने पर बैठ गए और पेराई सत्र शुरू होने से पहले वेतन लेने पर अड़ गए. सरकार ने वेतन देने के बजाय चीनी मिल को बंद करने का ही फैसला ले लिया और बड़ी संख्या में किसान पिछले चार साल में अपनी गन्ने की फसल को कहां-कहां और कैसे-कैसे बेचते है, ये दर्द किसान ही जानते हैं. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा के किसान अपना गन्ना उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की बहेड़ी चीनी मिल में डालने जाते हैं.   

ये देरी कहीं भाजपा के लिए चुनौती खड़ी ना कर दे 
अब यदि ये मान लिया जाए कि टेंडर प्रक्रिया अपनी गति से संपन्न हुई तो चीनी मिल सितम्बर तक किसी निवेशक को दी जा सकेगी. लेकिन, इस समय चीनी उद्योग और गन्ना विकास सचिव चंद्रेश यादव का तबादला हो गया और नए सचिव पंकज पांडेय चार्ज लेने से पहले एक महीने की ट्रेनिंग पर मसूरी अकादमी चले गए हैं. इस दौरान सरकार क्या वयवस्था करेगी ये देखने वाली बात होगी. निवेशक को चीनी मिल मिलने के बाद भी चार महीने का समय रिपेयरिंग में लगेगा और पेराई सत्र फरवरी तक जाकर शुरू होगा जो कि मुख्यमंत्री समेत तीन भाजपा विधायकों के क्षेत्रों में प्रतिकूल असर डालेगा. इसके राजनीतिक नफा नुकसान का आकलन भाजपा सरकार को समय रहते करना होगा.  

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