इन मतदाताओं के हौसले को सलाम, लोकतंत्र के महापर्व में हर बार समर्पित की है वोट की आहुति
लोकतंत्र के प्रति वहीं आस्था और सम्मान है जैसा देश में हुए पहले आम चुनाव के वक्त था। ये वो लोग हैं जिन्होंने कभी देश की दशा पर चिंता जताई तो कभी बढ़ते और बनते देश के साथ कदम मिलाकर अपने नागरिक होने के कर्तव्यों का बखूबी पालन किया।

ग्रेटर नोएडा, एबीपी गंगा: देश को गुलामी की जंजीरे तोड़ आजादी की सांस लेते हुए देखा। देश को बनते हुए देखा, सियासत देखी, विकास देखा और नेताओं के वादों और जुमलों को भी देखा। कभी देश की दशा पर चिंता जताई तो कभी बढ़ते और बनते देश के साथ कदम मिलाकर अपने नागरिक होने के कर्तव्यों का बखूबी पालन किया।
लोकतंत्र के प्रति आस्था
आज ये शरीर शिथिल पड़ गया है, आंखें थक गई हैं लेकिन जोश और जज्बे में कोई कमी नहीं आई है। लोकतंत्र के प्रति वहीं आस्था और सम्मान है जैसा देश में हुए पहले आम चुनाव के वक्त था। ये वही बुजुर्ग हैं जो एक बार फिर 17वीं लोकसभा के महापर्व पर वोट की आहुति देने अपनों का सहारा लेकर मतदान केंद्र तक पहुंचे।
आज भी जारी है मतदान का सिलसिला
आजादी के बाद 1951 में पहली बार लोकसभा के चुनाव हुए थे। इस बार 17वीं लोकसभा का चुनाव हो रहा है। देखने में आता है कि चुनावों में वोट डालने में हर व्यक्ति हर बार उत्साह नहीं दिखाता। लेकिन बहुत से मतदाता ऐसे भी हैं जिनका जोश न तो तब कम था और न ही आज कम है। पहले लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ वोटिंग करने के सिलसिला आज तक जारी है।
आसपास को लोगों को करती हैं प्रेरित
मेहमदपुर गांव की रहने वाली सुमित्रा (94) बताती हैं कि यादें तो धुंधली होती गई हैं लेकिन मतदान हर बार किया है। पहली बार 1951 में मतदान किया था और उस वक्त जोश था। परिवार के लोगों के साथ मतदान करनी गई थी। आद भी सुमित्रा परिवार के सदस्यों व आसपास के लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करती हैं।
पहले मतदान करना है
बिलासपुर निवासी धूम सिंह मावी (95) ने भी लगातार 17वीं बार लोकसभा चुनाव में मतदान किया। उनका कहना है पूर्व में जाति-धर्म के साथ ही आपसी मतभेद व अन्य चीजें हावी नहीं रहती थीं। लेकिन अब चुनावों में इनका बोलबाला रहता है। पहली लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक सिर्फ पार्टी के प्रत्याशी, छवि, विकास कार्यों आदि चीजों को देखने के बाद वोट देते हैं। प्रयास होगा जब तक सांस रहे मतदान करुं।
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL
























