सपा छात्रसभा के ड्रेस कोड में लाल की जगह अब नीला रंग, क्या हैं मायने?
समाजवादी पार्टी छात्र सभा के ड्रेस कोड में अब लाल रंग हटाकर नीले रंग की जींस-टीशर्ट शामिल कई गई है. माना जा रहा है कि यूपी चुनाव से पहले सपा दलित समुदाय पर फोकस करने के लिए यह कदम उठा रही है.

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने युवाओं और दलित वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है. इसी रणनीति के तहत पार्टी की फ्रंटल विंग समाजवादी छात्रसभा के ड्रेस कोड में बदलाव किया गया है. अब छात्रसभा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता पारंपरिक लाल रंग की जगह नीली जींस और नीली टी-शर्ट में नजर आएंगे.
8 सितंबर को लखनऊ में आयोजित छात्रसभा के सम्मेलन में पदाधिकारी और कार्यकर्ता इसी नए ड्रेस कोड में दिखाई देंगे. सपा के इस फैसले को महज संगठनात्मक बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके पीछे दलित और जेन-जी वोटरों तक पहुंच बनाने की राजनीतिक रणनीति भी मानी जा रही है.
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नीले रंग से PDA के 'D' को धार देने की कोशिश?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रंगों का अपना अलग सियासी संदेश रहा है. बहुजन समाज पार्टी का नीला रंग दलित राजनीति और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा से जुड़ा माना जाता है, जबकि समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से लाल और हरे रंग से रही है.
ऐसे में छात्रसभा के ड्रेस कोड में नीले रंग को प्रमुखता देना सियासी तौर पर अहम माना जा रहा है. इसे सपा के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण में दलित वर्ग को और मजबूती से जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
2024 में PDA फॉर्मूले से मिली थी बढ़त
समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर दलित वोट बैंक में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने PDA फॉर्मूले को जोर-शोर से आगे बढ़ाया था और चुनावी नतीजों में भी उसे इसका फायदा मिला.
अब पार्टी की नजर खास तौर पर युवा दलित वोटरों पर है. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सक्रिय युवाओं के बीच संगठन को मजबूत करने के लिए छात्रसभा को अहम भूमिका दी जा रही है.
जेन-जी और दलित युवाओं को जोड़ने की कोशिश
नई ड्रेस के जरिए पार्टी कॉलेज और विश्वविद्यालय की राजनीति में सक्रिय युवाओं तक एक राजनीतिक संदेश पहुंचाना चाहती है. नीले रंग को दलित अस्मिता और आंबेडकरवादी विचारधारा से जोड़कर देखा जाता है. ऐसे में सपा का यह प्रयोग दलित युवाओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और उन्हें PDA के साथ जोड़ने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. यानी छात्रसभा का बदला हुआ ड्रेस कोड सिर्फ कपड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि 2027 से पहले सपा की युवा और दलित वोटरों को साधने की बड़ी राजनीतिक कवायद का संकेत भी माना जा रहा है.
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