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बलिदान दिवस: फांसी के फंदे पर झूलने से पहले शहीद राम प्रसाद बिस्मिल ने कहे थे ये शब्द

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर जिले में हुआ था. 19 दिसंबर 1927 को उन्‍हें गोरखपुर जेल में फांसी दी गई थी. आज ही का दिन है जब वो आजादी की लड़ाई में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे.

गोरखपुर. काकोरी कांड के महानायक शहीद राम प्रसाद बिस्मिल का आज 93वां बलिदान दिवस है. राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर जिले में हुआ था. 19 दिसंबर 1927 को उन्‍हें मैनपुरी षड्यंत्र के आरोप में गोरखपुर जेल में फांसी दी गई थी. आज ही का दिन है जब वो आजादी की लड़ाई में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे. फांसी के फंदे पर लटकने के पहले उन्‍होंने अंग्रेजी में कहा था, “आई विश डाउनफाल ऑफ ब्रिटिश इम्‍पायर”.

सिर्फ 30 साल की उम्र में मिली थी फांसी की सजा गोरखपुर जिला जेल में 19 दिसंबर 1927 को जब राम प्रसाद बिस्मिल जब फांसी के फंदे पर झूले तो उनकी उम्र महज 30 साल थी. उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना अहम योगदान देते हुए हंसते-हंसते अपनी जान दे दी थी. यही वजह है कि काकोरी कांड के महानायक को पूरा देश आज नमन कर रहा है. उनके साथ काकोरी कांड में आरोपी बनाकर अंग्रेजों ने अशफाक उल्‍लाह खान, राजेन्‍द्र लहरी, रोशन सिंह के साथ फांसी की सजा सुनाई थी. 19 साल की उम्र में क्रांतिकारी आंदोलन में कूदे राम प्रसाद बिस्मिल उपनाम से कविता, शायरी और साहित्य लिखा करते रहे थे.

उनकी अंतिम यात्रा में डेढ़ लाख लोगों का हुजूम शामिल हुआ था. राजघाट पर राप्‍ती नदी के पावन तट पर उनका अंतिम संस्‍कार किया गया. इसके पहले अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर घंटाघर पर रखा गया था. उनकी शहादत के बाद उनकी मां ने कहा था कि मैं बेटे के भारत मां के बलिदान पर रोऊंगी नहीं. क्‍योंकि मुझे ऐसा ही ‘राम’ चाहिए था. मुझे उस पर गर्व है. फांसी के एक दिन पहले ही बिस्मिल अपने माता-पिता से मिले थे. बलिदान दिवस: फांसी के फंदे पर झूलने से पहले शहीद राम प्रसाद बिस्मिल ने कहे थे ये शब्द

"हिंदुस्तान रिपब्लिकन पार्टी में शामिल हुए थे बिस्मिल" पंडित राम प्रसाद बिस्मिल बलिदानी मेला खेल महोत्सव के आयोजनकर्ता और गुरु कृपा संस्थान के अध्‍यक्ष बृजेश राम त्रिपाठी ने बताया कि 11 जून 1897 में शाहजहांपुर में पैदा हुए राम प्रसाद ने देश को आजाद कराने के लिए हिंदुस्तान रिपब्लिकन पार्टी का दामन थामा और अंग्रेजों की नजर में आ गए. 9 अगस्त 1925 को इन लोगों ने काकोरी नाम की जगह पर ब्रिटिश हुकूमत के खजाने का लूट लिया. बाद में जांच होने पर राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान, रौशन सिंह और राजेन्द्र लहरी को सामूहिक रुप से फांसी की सजा सुनाई गई. बिस्मिल को फांसी के लिए गोरखपुर जेल लाया गया. जहां पर 19 दिसम्बर 1927 की सुबह 6 बजे उन्‍हें फांसी पर लटका दिया गया.

राम त्रिपाठी ने बताया कि इस बलिदान स्‍थली से आमजन को दूर रखा गया. उन लोगों के प्रयास और मांग के बाद प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ की पहल पर पं. राम प्रसाद बिस्मिल की बलिदान स्‍थली को आमजन के लिए खोला गया. उन्‍होंने बताया कि आजादी के दीवाने शहीद राम प्रसाद बिस्मिल ने इसी जेल में अपने अंतिम दिनों में अपनी आत्‍मकथा के साथ 11 किताबें लिखीं थीं. जिस समय बिस्मिल को लखनऊ जेल से गोरखपुर लाया गया, उस समय उनके ऊपर धारा 121 A, 120B, 396 IPC के तहत राजद्रोह और षड्यंत्र रचने के आरोप फांसी की सजा दी गई थी. बिस्मिल चार माह 10 दिन तक इस जेल में रहे.

वरिष्‍ठ जेल अधीक्षक डा. रामधनी ने बताया कि 19 दिसंबर 1927 को शहीद पं. राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी गई थी. इस दिन यहां पर मेला लगता है. यहां पर खिचड़ी और गुड़ आदि का प्रसाद वितरित कराया जाता है. पूरे देश को उनसे प्रेरणा लेना चाहिए. हम सभी को उन पर गर्व है. उन्‍होंने कहा कि यहां पर कोई भी बलिदान स्‍थली को नमन करने के लिए किसी भी वक्‍त आ सकता है. ये आम जनता के लिए खुला हुआ है. यहां पर सौंदर्यीकरण का काम भी चल रहा है.

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