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UP Assembly Election Explained: आकंड़े बताते हैं कि सपा कभी भी बीजेपी को अकेले हरा नहीं पाई है

UP Election: 1993 के विधानसभा चुनाव से लेकर आजतक के चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि समाजवादी पार्टी कभी भी बीजेपी को अकेले नहीं हरा पाई है. सपा को जब 2012 में ऐतिहासिक मिली थी तो उसके सामने बसपा थी.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणभेरी अभी बजी तो नहीं है. लेकिन राजनीतिक दलों ने बिसात बिछानी शुरू कर दी है. राजनीतिक टीकाकारों की राय और सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक इस बार सत्तारूढ़ बीजेपी का मुकाबला समाजवादी पार्टी से माना जा रहा है. लेकिन बसपा और कांग्रेस भी मजबूती से अपनी दावेदारी पेश करती नजर आ रही हैं. 

पिछले तीन दशक के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि केवल 2007, 2012 और 2017 का ही चुनाव ऐसा था जब किसी दल ने अकेले के बलबूते पर सूबे में सरकार बनाई हो. इस बार का मुख्य मुकाबला बीजेपी और सपा के बीच माना तो जा रहा है. लेकिन आकंड़े बताते हैं कि सपा कभी भी बीजेपी को अकेले हरा नहीं पाई है.  

चार अक्तूबर 1992 को अपनी स्थापना के बाद सपा ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में पहला विधानसभा चुनाव 1993 में लड़ा था. इस चुनाव के लिए सपा ने बसपा से गठबंधन किया था. इसी चुनाव में नारा मशहूर हुआ, 'मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम'. 

साल 1993 के चुनाव में बीजेपी ने 422 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसे 177 सीटों पर जीत मिली थी. उसे 1 करोड़ 66 लाख 37 हजार 720 वोट या 33.30 फीसद वोट मिले थे.

वहीं सपा ने 256 सीटों पर चुनाव लड़कर 109 सीटों पर विजय पताका फहराई थी. इस चुनाव में सपा के खाते में 89 लाख 63 हजार 697 वोट या 17.94 फीसदी वोट आए थे. सपा की सहयोगी बसपा ने 164 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से 67 सीटों पर उसके उम्मीदवार जीते थे. बसपा को 55 लाख 54 हजार 76 वोट या 11.12 फीसदी वोट मिले थे. 

कांग्रेस 421 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. लेकिन उसे केवल 28 सीटें ही मिली थीं. कांग्रेस पर 75 लाख 33 हजार 272 या 15.08 फीसदी मतदाताओं ने विश्वास जताया था.

इस चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे. लेकिन लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा ने 1995 में सरकार से समर्थन वापस ले लिया. बाद में बीजेपी के समर्थन से मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं. 

1996 के चुनाव में किसे मिली थी जीत?

राष्ट्रपति शासन के तहत हुए 1996 के विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन बने. गेस्ट हाउस कांड से आहत बसपा ने कांग्रेस से हाथ मिलाया. लेकिन यह गठबंधन बीजेपी और सपा के आगे धराशायी हो गया.  

साल 1996 में बीजेपी ने 414 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसे 174 सीटों पर जीत मिली थी. बीजेपी को इस चुनाव में 1 करोड़ 80 लाख 28 हजार 820 वोट या 32.53 फीसदी वोट मिले थे.  

सपा ने इस चुनाव में 281 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से 110 चुनाव जीते थे. सपा पर 1 करोड़ 20 लाख 85 हजार 226 या 21.80 फीसदी वोटर ने भरोसा जताया था.

कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ रही बसपा ने 296 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. उसे 67 सीटों पर जीत मिली थी. बसपा को 1 करोड़ 8 लाख 90 हजार 716 वोट या 19.64 फीसदी वोट मिले थे. वहीं 126 सीटों पर चुनाव लड़ी कांग्रेस केवल 33 सीटें ही जीत पाई थी. कांग्रेस पर 46 लाख 26 हजार 663 मतदाताओं ने भरोसा जताया था. उसे कुल पड़े वोटों के 8.35 फीसदी वोट मिले थे. 

इस चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता पर बीजेपी एक बार फिर से वापसी हुई थी. और वह 2002 तक सत्ता में रही. 

2002 के चुनाव में किसे मिली थी जीत?

उत्तर प्रदेश के बंटवारे के बाद 2002 के चुनाव में विधानसभा की 403 सीटें ही रह गई थीं. बीजेपी ने 320 सीटों पर चुनाव लड़ा और 88 पर जीत हासिल की. उसे 20.08 फीसदी वोट मिले थे. वहीं 390 सीटों पर लड़ने वाली सपा को 143 सीटों पर जीत मिली थी. उसे 25.37 फीसदी वोट मिले थे. बसपा ने 401 सीटों पर चुनाव लड़कर 98 सीटों पर जीत दर्ज की थी. उसे 23.06 फीसद वोट मिले थे. कांग्रेस ने 402 सीटों पर चुनाव लड़ा था. लेकिन वह 25 सीटें ही जीत पाई थी. कांग्रेस को 8.96 फीसद वोट मिले थे. 

इस चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने की वजह से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था. इस दौरान बसपा में हुई टूट और बीजेपी की कलाबाजियों के बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. 

कब बीएसपी की किस्मत चमकी?

साल 2007 में हुआ विधानसभा चुनाव बीजेपी ने 350 सीटों पर लड़ा था. लेकिन उसे 51 सीटों पर ही जीत मिली थी. उसे 16.97 फीसदी वोट मिले थे. वहीं 393 सीटों पर लड़ने वाली सपा केवल 97 सीटें ही जीत पाई थी. उसे 25.43 फीसदी मिले थे.

बसपा के लिए 2007 का चुनाव ऐतिहासिक साबित हुआ. उसने 403 सीटों पर चुनाव लड़कर 206 सीटों पर जीत दर्ज की थी. उस पर 30.43 फीसद मतदाताओं ने विश्वास जताया था. उत्तर प्रदेश का यह चुनाव ऐतिहासिक इस मायने में भी था कि ब्राह्मण मतदाताओं ने बसपा पर विश्वास जताया था.  

कांग्रेस ने यह चुनाव 393 सीटों पर लड़ा. लेकिन उसे 22 पर ही जीत मिली. उसे 8.61 फीसदी वोट मिले थे. इस चुनाव में बसपा ने पहली बार अपने बूते पर पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई थी. और मायावती पूरे 5 साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहीं.

अकेले दम पर जब चमकी सपा की किस्मत 

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 398 उम्मीदवार उतारे थे. उसे केवल 15 फीसद वोट और 47 सीटें ही मिली थीं. वहीं 403 सीटों पर लड़ने वाली बीएसपी केवल 80 सीटें ही जीत पाई थी. उसे 25.91 फीसदी वोट मिले थे. कांग्रेस 11.65 वोटों के साथ केवल 28 सीटें ही जीत पाई थी. 

सपा ने यह चुनाव मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में लड़ा था. 401 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली सपा को 224 जीत मिली थी. उसे 29.13 फीसदी वोट मिले थे. इस शानदार सफलता के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री का ताज अपने बेटे अखिलेश यादव के सिर पर सजा दिया था. इस चुनाव में सपा का मुकाबला बसपा से था, जो प्रदेश की सत्ता में थी.

जब जनता ने बीजेपी को सत्ता की चाभी दी...

साल 2017 का चुनाव बीजेपी के लिए जैकपॉट साबित हुआ. बीजेपी ने 384 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 312 सीटों पर जीत दर्ज की थी. उसे 39.67 फीसदी वोट मिले थे. यूपी में बीजेपी का यह अबतक का सबसे शानदार प्रदर्शन था.  

वहीं 2012 में इतिहास रचने वाली सपा को इस चुनाव में केवल 47 सीटें ही नसीब हुईं. उसने 311 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इस बार उसे केवल 21.82 फीसदी ही वोट मिले. बसपा ने और भी खराब प्रदर्शन किया. उसे केवल 19 सीटों पर ही जीत मिली. बसपा को 22.23 फीसदी वोट मिले थे. वहीं कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केलल 7 सीटें ही जीत पाई थी. कांग्रेस के हिस्से में 6.25 फीसद वोट आए थे. 

उत्तर प्रदेश की सत्ता पर 4 बार काबिज हुई समाजवादी पार्टी कभी भी सीधे मुकाबले में हरा नहीं पाई है. जब उसे ऐतिहासिक जीत मिली थी, उस समय उसका मुकाबला सत्तारूढ़ बसपा से था. इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार के चुनाव में समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगी बीजेपी को पटकनी दे पाते हैं या नहीं.

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