Basti News: पुल पर सियासत, जनता बेहाल, 10 हजार लोगों की जिंदगी दांव पर
Basti News In Hindi: आधा पुल रुदौली विधानसभा में पड़ता है जबकि पुल का आधा हिस्सा कप्तानगंज विधानसभा में आता है. इस वजह से दोनों विधानसभा के विधायक इस पुल को लेकर अपनी वोट राजनीति के चश्मे सेदेखते हैं.

उत्तर प्रदेश के बस्ती में विकास खंड रामनगर में कुआनो नदी पर पुल न होने से कई गांवों का जीवन बुरी तरह प्रभावित है. आलम ये है कि ग्रामीण अपने खर्चे पर लकड़ी का कच्चा पुल तैयार करते हैं, जो बारिश में नदी का बहाव बढ़ने से तिनके की तरह बह जाता है. स्थानीय ग्रामीन लंबे अरसे से स्थायी पुल के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन स्थिति जस की तस है.
दैनिक कार्यों के लिए हजारों लोग इधर से उधर जाते हैं, लेकिन जब पुल बह जाता है तो वे अपने जीवन को दांव पर लगाकर नाव के सहारे किनारा ढूंढते हैं. स्थानीय सपा विधायक राजेन्द्र चौधरी ने बीजेपी पर उपेक्षा का आरोप लगाया है.
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रुदौली और कप्तानगंज विधानसभा में आता है नदी का हिस्सा
रामनगर और गौर विकास खंड के दर्जनों गांवों के लोग अपने निजी खर्च और शारीरिक श्रम से लकड़ी का एक अस्थायी चचरी पुल तैयार करते हैं. इससे किसी तरह साइकिल और बाइक तो पार हो जाती हैं, लेकिन जैसे ही पहली बारिश आती है, नदी का तेज बहाव इस पुल को तिनके की तरह बहा ले जाता है. इसके बाद शुरू होता है मौत से आंखें मिलाकर नाव के सफर का सिलसिला.
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ये पुल दो विधानसभा को जोड़ता है, आधा पुल रुदौली विधानसभा में पड़ता है जबकि पुल का आधा हिस्सा कप्तानगंज विधानसभा में आता है, इस वजह से दोनों विधानसभा के विधायक इस पुल को लेकर अपनी वोट राजनीति के चश्मे से देखते है जिसका खामियाजा आज भी इस इलाके की जनता झेल रही है.
10 हजार की आबादी आवाजाही करती है
इस घाट से रोजाना करीब 10 हजार की आबादी आवाजाही करती है. सबसे बदतर स्थिति उन मासूम स्कूली बच्चों की होती है, जिन्हें गौर और बभनान के स्कूलों में पढ़ने जाना पड़ता है. उफनती नदी में डगमगाती नाव पर बैठे बच्चों को देख नदी किनारे खड़े अभिभावकों की सांसें अटकी रहती हैं. ग्रामीणों का कहना है कि नेताओं के लिए यह सिर्फ एक पुल का मुद्दा हो सकता है, लेकिन हमारे लिए यह हमारे बच्चों की जिंदगी का सवाल है.
पुल न होने की मार सिर्फ स्कूली बच्चों पर ही नहीं, बल्कि किसानों और मरीजों पर भी पड़ रही है.आपातकाल में या चार पहिया वाहनों से जाने के लिए ग्रामीणों को महज 6 किलोमीटर का सफर तय करने के लिए 22 किलोमीटर का लंबा चक्कर काटना पड़ता है. इससे समय, पैसा और ईंधन तीनों की भारी बर्बादी हो रही है, जिससे क्षेत्र का आर्थिक विकास पूरी तरह ठप पड़ा है.
बीजेपी सरकार पर अनदेखी का आरोप
इस मामले पर सियासत भी गरमाई हुई है. समाजवादी पार्टी के विधायक अतुल चौधरी ने बताया, मैंने इस जनहित के मुद्दे को कई बार विधानसभा सदन में उठाया है और शासन को पत्र भी भेजा है, लेकिन सरकार द्वारा इस पुल के लिए बजट पास नहीं किया जा रहा है.
वहीं सपा विधायक राजेंद्र चौधरी ने सरकार पर अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा, यह पुल कप्तानगंज और रूधौली विधानसभा को जोड़ता है. पिछले 4 साल से हम लगातार इसकी मांग कर रहे हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार इसे स्वीकृत नहीं कर रही है.
पक्ष और विपक्ष के इन सियासी आरोपों के बीच पिसने के लिए सिर्फ आम जनता ही रह गई है. सरकारें बदलीं, जनप्रतिनिधि बदले, लेकिन नहीं बदली तो पगारे घाट के लोगों की तकदीर. डिजिटल इंडिया और बुलेट ट्रेन के इस दौर में 10 हजार लोगों का एक अदद पुल के लिए तरसना पूरे प्रशासनिक अमले और नीति निर्धारकों के गाल पर तमाचा है. प्रशासन को राजनीति से ऊपर उठकर इस जीवन-मरण के मुद्दे पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए.
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