यूपी में कैसी है बीजेपी की स्थिति? विधानसभा चुनाव के 9 महीने पहले Axis My India के प्रदीप गुप्ता ने कर दिया बड़ा दावा
UP Election 2027: UP में 2027 में चुनाव प्रस्तावित हैं. इससे पहले एक्सिस माय इंडिया के चेयरमैन ने बड़ा दावा किया है. उन्होंने मौजूदा सरकार को लेकर लोगों की राय पर अपना आकलन पेश किया है.

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं. पुराने चुनाव की तारीखों के आधार पर देखें तो अभी चुनाव में कम से कम 9 महीने बचे हुए हैं. इससे पहले एक्सिस माय इंडिया के चेयरमैन प्रदीप गुप्ता ने यूपी को लेकर बड़ा दावा किया है. उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति का उदाहरण देते हुए यह भी कहा कि यूपी ऐसा राज्य है जहां संतुष्टि का स्तर अच्छा होने के बावजूद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल जाते हैं
एक्सिस माय इंडिया के चेयरमैन प्रदीप गुप्ता ने कहा, UP में संतुष्टि का स्तर अच्छा है; इसी आधार पर, ऐसा लगता है कि कोई बड़ी समस्या नहीं है. लेकिन यह एक अलग तरह का राज्य है, यहां चीज़ें बहुत तेज़ी से बदलती हैं. अगर मौजूदा सरकार का काम अच्छा नहीं होता, तो लोग दूसरे विकल्पों की तलाश करते हैं. यहां इसी तरह से काम होता है.
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समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए साक्षात्कार में उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि यूपी में समाजवादी पार्टी करीब 26 फीसदी वोट शेयर पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुकी है, जबकि बसपा चीफ मायावती भी लगभग 29 फीसदी वोट शेयर के साथ सत्ता में आई थीं. उनका कहना था कि अगर वोटों का बंटवारा ज्यादा होता है तो 25 फीसदी वोट शेयर वाली पार्टी भी चुनाव जीत सकती है.
2022 के चुनाव परिणाम किस ओर कर रहे इशारा?
2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणामों ने स्पष्ट कर दिया था कि राज्य की राजनीति में वोट शेयर और सीट शेयर का गणित कितना अलग हो सकता है. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 41.29 प्रतिशत वोट हासिल कर 255 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि समाजवादी पार्टी को 32.06 प्रतिशत वोट के साथ 111 सीटें मिलीं. वहीं बहुजन समाज पार्टी का वोट शेयर 12.88 प्रतिशत रहने के बावजूद पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 399 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल 2 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 2.33 प्रतिशत रहा.
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साल 2022 के चुनाव परिणामों का आंकलन करें तो यूपी में बहुकोणीय मुकाबले और वोटों के बंटवारे का सीधा असर सीटों पर पड़ता है. यही वजह है कि कम वोट शेयर वाली पार्टी भी बड़ी संख्या में सीटें जीत सकती है, जबकि अच्छा वोट प्रतिशत पाने वाली पार्टी सीटों में पिछड़ सकती है. इसके अलावा NOTA को भी 6 लाख से ज्यादा वोट मिले, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों को लगभग 10 लाख वोट मिलने के बावजूद कोई सीट नहीं मिली.























