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'हिंदू विवाह केवल रजिस्टर्ड न होने से अमान्य नहीं', इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

UP News: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 में विवाह पंजीकरण का प्रावधान जरूर है, लेकिन इसके अभाव में विवाह अमान्य नहीं होता.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह की वैधता केवल पंजीकरण पर निर्भर नहीं करती. विवाह का रजिस्टर्डहोना इसे अवैध या अमान्य नहीं बनाता. अदालत ने कहा कि विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र महज एक साक्ष्य (Evidence) है, विवाह की वैधता का आधार नहीं.

आजमगढ़ निवासी सुनील दुबे ने फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. दरअसल, सुनील दुबे और उनकी पत्नी मीनाक्षी ने 23 अक्टूबर 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(बी) के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की थी.

सुनवाई के दौरान फैमिली कोर्ट ने पति को विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया. जब पति ने प्रमाणपत्र न होने की स्थिति में छूट की मांग की तो कोर्ट ने 31 जुलाई 2025 को उसका आवेदन खारिज कर दिया और कहा कि नियमों के अनुसार विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करना अनिवार्य है. इसी आदेश के खिलाफ सुनील दुबे ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

याचिकाकर्ता द्वारा कोर्ट में दी गई दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 में विवाह पंजीकरण का प्रावधान जरूर है, लेकिन इसके अभाव में विवाह अमान्य नहीं होता. उनका विवाह 27 जून 2010 को हुआ था, जबकि उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली, 2017 बाद में लागू हुई. नियमावली 2017 की धारा 6 के अनुसार भी, पंजीकरण न होने से विवाह अवैध नहीं होता. पति की इस दलील का पत्नी मीनाक्षी ने भी समर्थन किया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला

जस्टिस मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विवाह पंजीकरण का उद्देश्य केवल विवाह को साबित करने का सुविधाजनक साधन उपलब्ध कराना है. इसकी अनुपस्थिति में विवाह की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8(5) में प्रावधान है कि विवाह का पंजीकरण न होना इसे अमान्य नहीं बनाता. साथ ही, 2010 में हुआ विवाह चूंकि पंजीकृत नहीं था, इसलिए विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करने की आवश्यकता ही नहीं थी.

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का 31 जुलाई 2025 का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि विवाह प्रमाणपत्र की मांग पूरी तरह अनुचित थी. अदालत ने आजमगढ़ फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह लंबित तलाक याचिका पर जल्द निर्णय ले और दोनों पक्षों को अपने साक्ष्य पेश करने का अवसर दे.

आखिर क्या है फैसले का महत्व

यह निर्णय खासतौर से उन मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां विवाह पुराने समय में हुआ हो और उसका पंजीकरण न कराया गया हो. ऐसे मामलों में केवल विवाह प्रमाणपत्र के अभाव में पति-पत्नी के अधिकार प्रभावित नहीं किए जा सकते.

सौरभ मिश्रा प्रयागराज के निवासी हैं. वह पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अपने करियर की शुरुआत सौरभ ने 2020 में इंडिया अहेड से की, इसके बाद रिपब्लिक भारत में 2 महीने कार्य किया. सौरभ, वर्ष 2023 से अप्रैल 2025 तक मैं हिंदी खबर में एसोसिएट रिपोर्टर रहे. इन्होंने कई बड़े स्तरीय इवेंट और जन-सरोकार की खबरें कवर किए हैं. निष्पक्ष और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग इनकी प्राथमिकता है.सौरभ ने पत्रकारिता जगत में पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया है उन्हें हर दिन कुछ नया सीखना, लोगों से संवाद करना और समाज से जुड़े मुद्दों पर काम करना पसंद है. सौरभ ने स्नातक की पढ़ाई कानपुर यूनिवर्सिटी से की है और वर्तमान में भी पत्रकारिता से जुड़े हैं.
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