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Deepawali 2023: दीपों के त्योहार पर झालर और मोमबत्ती ने किया दीयों को लाचार, डिमांड कम होने से कुम्हार परेशान

Bharatpur News: दीपावली पर लाखों की संख्या में बनने वाले दीये हजारों की संख्या में बनने लगे हैं. पहले मिट्टी के दीयों की डिमांड हुआ करती थी, लेकिन अब वह डिमांड धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है.

Rajasthan News: दीपावली के त्योहार की तैयारी कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती है. घर की साफ-सफाई से लेकर रंगाई-पोताई का काम कई दिन पहले ही शुरू हो जाता है. दीपावली पर बाजार सजने लग जाते है और घर-घर मिट्टी के दीये जलाये जाते हैं. ऐसे में मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्भकार कई दिन पहले से ही मिट्टी के दिये बनाने लग जाते है. इस बीच अब अब मिट्टी के दीये की जगह चाइना के इलेक्ट्रॉनिक आइटम जगह ले ली है. झालर और मोमबत्ती ने दीयों और कुम्भकार को लाचार कर दिया है.
 
पहले दीपों के त्योहार दीपावली पर घर-घर में मिट्टी के दीपक में तेल और बाती से जगमग रोशनी हुआ करती थी, लेकिन अब वह रौशनी धीरे धीरे ख़त्म होने की कगार पर है. अब लोग मिट्टी के दीयों की जगह चाइना के इलेक्ट्रॉनिक आइटमों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं. लोग झालर और मोमबत्ती का ज्यादा प्रयोग करते हैं. जबकि, पहले दीपावली पर दीयों की मांग अधिक रहती थी. दीपावली नजदीक आते ही कुम्भकार मिट्टी के दीपक बनाना शुरू कर देते थे. पहले दीपावली पर भरतपुर शहर में कुम्भकार लगभग 10 लाख दीये बनाते थे, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक झालर और मोमबत्ती ने कुम्भकार समाज की दीपावली को फीका कर दिया है.
 
कम बनने लगे निट्टी के दीए
बता दें कि, अब दीपावली पर लाखों की संख्या में बनने वाले दीये हजारों की संख्या में बनने लगे हैं. पहले दीपावली पर मिट्टी के दीये की बाजार में डिमांड भी हुआ करती थी, लेकिन अब वह डिमांड धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. अब कुम्भकार का व्यापार और कला खत्म होती जा रही है. अगर प्रजापत समाज का ये व्यापार खत्म हो जाता है, तो वह अपने परिवार का पालन-पोषण भी नहीं कर पाएंगे. ऐसे में जो दीपावली उनके लिए पहले खुशियां लेकर आती थी, उसी दीपावली पर अब कुम्भकारों के चेहरे पर मायूसी दिखाई देती है .
 
अब आसानी से मिटटी भी नहीं मिलती 
दीपावली पर मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्भकार पप्पू ने बताया कि, पहले शहर के बाहर निकलते ही मिट्टी मिल जाया करती थी, लेकिन अब शहरों की आबादी बढ़ने के साथ खाली जगह पर कॉलोनियां बन गई है. ऐसे में अब खली जगह नहीं रहने से कुम्भकार को मिट्टी की समस्या से जूझना पड़ता है. मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी बाहर से मंगानी पड़ती है, जो मिट्टी की ट्राली पहले 600 रूपये में मिल जाती थी अब वही मिट्टी की ट्रॉली 4000 रुपये की आती है. इसके अलावा दीयों को पकाने के लिए गोबर के उपलों की जरुरत पड़ती है, जिसका उन्हें अब पहले की अपेक्षा ज्यादा दाम देना पड़ता है. 
 
अपना पुश्तैनी काम छोड़ रहे लोग
अब आधुनिक जमाना है रसोई में मिट्टी के मटके की जगह स्टील की तमेड़ी ने ले ली है. मिट्टी के कुल्ली-सकोरी की जगह प्लास्टिक के गिलास और दोना ने ले ली है. इसलिए कुम्भकार समाज के युवा अपना पुश्तैनी कार्य मिटटी के बर्तन, खिलौना, दीपक आदि बनाना छोड़ कर अन्य मेहनत मजदूरी के काम करने लगे हैं. कुछ तो शादियों में हलवाई का काम करने लगे हैं, कुछ अन्य काम कर रहे हैं. हलवाई का काम कर रहे छोटे हलवाई ने बताया कि, मेरे बेटे और मैं हलवाई का काम करते हैं.  हमारा पुस्तैनी काम मिटटी का बर्तन बनाना था. अब मिटटी के बर्तन कोई खरीदता नहीं है, इसलिए परिवार चलाने के लिए इस पुश्तैनी काम को छोड़कर हलवाई का काम और मेहनत मजदूरी करनी पड़ रही है.     

 

 

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