Rajasthan: धर्मांतरण बिल के खिलाफ जारी है लड़ाई! इन संगठनों का फोरम गठित, सुप्रीम कोर्ट तक जाने की तैयारी
Rajasthan News: राजस्थान में धर्मांतरण बिल को लेकर दो दर्जन से अधिक संगठनों ने मिलकर फोरम बनाया है. यह फोरम गवर्नर से बिल को मंजूरी नहीं देने की अपील और कानूनी चुनौती की तैयारी कर रहा है.

राजस्थान में विधानसभा से पास हो चुके एंटी कन्वर्जन यानी धर्मांतरण बिल को लेकर मचा कोहराम फिलहाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. इस बिल के विरोध में राजस्थान में सक्रियता से काम करने वाले तकरीबन दो दर्जन मानवाधिकार- सामाजिक, सियासी व कानूनी संगठनों ने एक फोरम का गठन किया है और व्यापक तौर पर इसके विरोध की रणनीति तय की है.
यह फोरम गवर्नर से मिलकर उनसे इस बिल को मंजूरी नहीं देने की अपील करेगा. इसे लेकर हस्ताक्षर अभियान चलाएगा. जिले में सभाएं की जाएंगी. लोगों को जागरूक व लामबंद किया जाएगा. इसके अलावा कानून बनने की सूरत में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी जाएगी. फोरम का मानना है कि विधानसभा से पास हुआ धर्मांतरण का बिल पूरी तरह संविधान की भावनाओं के खिलाफ है. समाज को आपस में बांटने वाला है और साथ ही नफरत को बढ़ावा देने वाला है.
कौन होंगे फोरम में शामिल?
एंटी कन्वर्जन बिल के खिलाफ बने फोरम में शामिल संगठनों में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज यानी पीयूसीएल, राजस्थान बौद्ध महासंघ, जमाअत-ए-इस्लामी, जमीअत उलेमा-ए-हिन्द, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, दलित मुस्लिम एकता मंच, जयपुर क्रिश्चियन फेलोशिप, राजस्थान समग्र सेवा संघ, APCR राजस्थान, वेलफेयर पार्टी, एनएफआईडब्लू, राजस्थान बौद्ध महासंघ, AIDWA, दमन प्रतिरोध आंदोलन, यूथ बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया, एसडीपीआई और राजस्थान नागरिक मंच प्रमुख है.
फोरम के लिए हुई बैठक में जारी किए गए ये संदेश
धर्मांतरण बिल के खिलाफ बने फोरम के गठन के लिए राजधानी जयपुर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि इस बिल के कानून बनने पर नागरिकों को संविधान में मिले अधिकारों पर कुठाराघात होगा. यह एक धर्म विशेष को बढ़ावा देने वाला और बाकी धर्मों के लोगों को नीचा दिखाने और उनका उत्पीड़न करने वाला साबित होगा. स्वतंत्र रूप से पूजा पद्धति को अपनाना और अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करना लोगों का अधिकार है, लेकिन इसके जरिए अल्पसंख्यक वर्ग का उत्पीड़न किए जाने की तैयारी है.
फोरम गठन के मौके पर मसीही समुदाय के कई ऐसे पीड़ितों को भी पेश किया गया, धर्म के नाम पर जिनका उत्पीड़न किया गया. दावा यह किया गया कि उत्पीड़न में सरकारी अमले के लोग या तो खुद भी शामिल थे या फिर उन्होंने पीड़ितों की कोई मदद नहीं की. यह दावा किया गया कि अगर अभी यह हाल है तो बिल के कानून बनने के बाद लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रार्थना भी नहीं कर सकेंगे.
इस मौके पर पीयूसीएल की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने बताया कि देश के जिन भी 12 राज्यों में धर्मांतरण से जुड़ा कानून बनाया गया है, उनमें सबसे सख्त प्रावधान राजस्थान में ही रखे गए हैं. उम्र कैद तक की सजा और बुलडोजर से बिल्डिंग को गिराए जाने का प्रावधान पूरी तरह से असंवैधानिक है. उनके मुताबिक यह कतई धार्मिक मुद्दा नहीं है बल्कि सीधे तौर पर मानवाधिकारों का हनन है. ऐसे में सभी को साथ मिलकर इसका विरोध करना चाहिए और तीसरी कोशिश में भी इसे राजस्थान में कानून नहीं बनने देना चाहिए. फोरम में शामिल सभी संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस बात का ऐलान किया है कि वह हर स्तर पर इसका विरोध करेंगे और साथ ही इस मुद्दे को अदालत की दहलीज तक ले जाएंगे.
पहले भी धर्मांतरण बिल हो चुका है पारित
गौरतलब है कि राजस्थान विधानसभा में धर्मांतरण बिल सबसे पहले साल 2005 में तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार ने पारित किया था. विधानसभा से बिल पारित होने के बाद इसे मंजूरी के लिए राज्य की तत्कालीन गवर्नर प्रतिभा पाटिल के पास भेजा गया. विपक्ष और तमाम संगठनों ने आपत्ति जताते हुए गवर्नर से इसे मंजूरी नहीं दिए जाने की अपील की थी. गवर्नर प्रतिभा पाटिल ने इस बिल को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को भेज दिया था.
काफी दिनों तक बिल राष्ट्रपति भवन में पेंडिंग रहा तो सरकार ने इसे वापस ले लिया. वसुंधरा राजे सरकार ने साल 2008 में विधानसभा चुनाव से पहले धर्मांतरण बिल फिर से विधानसभा से पारित कराया, लेकिन दूसरी बार भी यह कानून नहीं बन सका. साल 2008 में पारित बिल को तत्कालीन गवर्नर शैलेंद्र कुमार सिंह ने खुद मंजूरी नहीं दी और इसे उस वक्त की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को भेज दिया. राष्ट्रपति भवन में यह बिल 10 साल तक अटका रहा. साल 2018 में राष्ट्रपति भवन ने इस बिल को कुछ आपत्तियों के साथ वापस भेज दिया.
दिसंबर 2023 में राजस्थान में भजनलाल शर्मा की अगुवाई में बीजेपी की सरकार बनने के बाद धर्मांतरण विरोधी कानून को लेकर फिर से कवायद शुरू हुई. इसी साल फरवरी महीने में विधानसभा के बजट सत्र में बिल पेश भी किया गया, लेकिन उस पर चर्चा नहीं हो सकी थी. राजस्थान कैबिनेट ने इसी साल 31 अगस्त को प्रस्तावित विधेयक में बड़े बदलाव करते हुए इसे मंजूरी दी और संशोधित बिल मानसून सत्र में पेश किया गया. 9 सितंबर को विपक्ष के हंगामे के बीच सरकार ने इसे ध्वनि मत से पारित करा लिया. विधानसभा से पारित होने के बाद इसे गवर्नर के यहां मंजूरी के लिए भेजा गया है.
























