मंत्री-अफसरों की जंग में फंसे 72 करोड़, बच्चे टूटे बर्तनों में खाने को मजबूर
राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों की थाली पर मंत्री और अफसरों के बीच खींचतान देखने को मिल रही है. इस कारण शिक्षा विभाग में बर्तन खरीद का 72 करोड़ रुपये का बजट अटका पड़ा है.

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों की थाली पर अब सियासत और अफसरशाही की लड़ाई भारी पड़ रही है. शिक्षा विभाग में बर्तन खरीद का 72 करोड़ रुपये का बजट महीनों पहले मंजूर हो चुका है, लेकिन इस खींचतान के चलते बर्तन खरीद की फाइल ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है. इस मामले में शिक्षा मंत्री कुछ चाहते हैं और अधिकारी कुछ. इस खींचतान में सजा भुगत रहे हैं प्रदेश के 53,738 सरकारी स्कूलों के बच्चे.
पूरा मामला मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) के बर्तनों का है. प्रदेश के स्कूलों में जो बर्तन इस्तेमाल हो रहे हैं, वो 2009 में खरीदे गए थे यानी 16 साल पुराने. कई स्कूलों में तो बर्तन टूट चुके हैं, पतीले में छेद हो गए हैं, थालियां मुड़ गई हैं. उसी में रोज बच्चों को खाना परोसा जा रहा है.
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क्या है विवाद की जड़ ?
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर चाहते हैं कि बर्तन खरीद का अधिकार सीधे स्कूलों को दे दिया जाए. इससे स्कूल अपनी जरूरत के हिसाब से तुरंत बर्तन खरीद लेंगे, लेकिन विभाग के अधिकारी इसके खिलाफ हैं. अधिकारियों का तर्क है कि केंद्रीकृत व्यवस्था (एक जगह से खरीद) ही बेहतर है. इससे एक जैसे बर्तन आएंगे और गुणवत्ता बनी रहेगी. मंत्री और अधिकारियों की इसी सोच के टकराव में फाइल आगे ही नहीं बढ़ रही है. शिक्षा मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश भी दिए हैं कि जल्द खरीद प्रक्रिया शुरू की जाए, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ.
बच्चे कैसे खा रहे हैं खाना ?
पड़ताल में सामने आया है कि कई स्कूलों में बच्चे टूटे-फूटे बर्तनों में खाना लेने को मजबूर हैं. कहीं-कहीं तो एक ही थाली में दो बच्चों को खिलाया जा रहा है. शिक्षक भी मानते हैं कि इस हालत में बच्चों को खाना खिलाना मुश्किल हो गया है.
सरकार ने क्या बजट तय किया है ?
सरकार ने इसके लिए 71 करोड़ 90 लाख 90 हजार रुपये का बजट तय किया है. इसमें से 43 करोड़ 14 लाख 54 हजार रुपये केंद्र सरकार देगी और 28 करोड़ 76 लाख 36 हजार रुपये राज्य सरकार का हिस्सा है. हर स्कूल को उसकी छात्र संख्या के हिसाब से पैसा देने की योजना है.
- 50 तक बच्चे वाले 25,476 स्कूलों को 10-10 हजार रुपये
- 150 तक बच्चे वाले 21,412 स्कूलों को 15-15 हजार रुपये
- 250 तक बच्चे वाले 5,620 स्कूलों को 20-20 हजार रुपये
- 251 से ज्यादा बच्चे वाले 1,230 स्कूलों को 25-25 हजार रुपये
सबसे बड़ा सवाल कब होगा समाधान?
2009 के बाद से बर्तन नहीं बदले. सरकार ने बजट भी तय कर दिया, फिर भी सिर्फ फैसले के फेर में योजना अटकी है. मंत्री कहते हैं प्रक्रिया शुरू करो, अधिकारी फाइल घुमाते हैं. आखिर इस लड़ाई का खामियाजा कब तक बच्चे भुगतेंगे ? क्या इस टकराव के कारण बच्चों को ऐसे ही टूटे बर्तनों में खाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.
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