मराठा आरक्षण के चेहरा मनोज जरांगे कौन हैं? पढ़ाई से लेकर पेशा तक...जानें सबकुछ
मराठा आरक्षण को लेकर आंदोलन कर मनोज जरांगे एक बार फिर चर्चा में हैं. सरकार ने उनकी बातें मान ली है. उन्होंने मंगलवार (2 सितंबर) को पांच दिनों से जारी अनशन खत्म किया.जानें उनके बारे में डिटेल-

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की चर्चा होते ही जिस व्यक्ति का नाम सबसे पहले सामने आता है, वह है मनोज जरांगे पाटील. बीड ज़िले के अंबाजोगाई तालुका के अंतरवाली सराटी गांव में जन्मे जरांगे आज मराठा समाज की आवाज और संघर्ष का प्रतीक बन चुके हैं.
शिक्षा और परिवार
जरांगे का बचपन ग्रामीण माहौल में बीता. सीमित आर्थिक साधनों के कारण वे उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाए. वे साधारण किसान परिवार से आते हैं. उनके पास खेती ही मुख्य साधन है. मनोज जरांगे विवाहित हैं और दो बेटों के पिता हैं. उनका परिवार खेती और समाजसेवा से जुड़ा हुआ है.

आंदोलन की शुरुआत
समाज और किसानों के मुद्दों को उठाने का काम मनोज जरांगे ने लगभग 15 साल पहले शुरू किया. स्थानीय स्तर पर आवाज उठाते-उठाते वे धीरे-धीरे बड़े आंदोलन का हिस्सा बने.
2013–14 में जब मराठा आरक्षण की मांग जोर पकड़ रही थी, तब उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई. लेकिन 2021 के बाद उनका संघर्ष और तीखा हुआ जब अपने गांव में अनशन में बैठे. मनोज जरांगे पाटील के आंदोलन में पुलिस ने लाठीचार्ज किया .
2023 में जालना ज़िले से शुरू किया गया उनका अनशन आंदोलन पूरे राज्य में सुर्खियों में आया और तभी वे मराठा आरक्षण आंदोलन का चेहरा बन गए.

राजनीतिक दृष्टिकोण
जरांगे किसी भी पार्टी से सीधे तौर पर जुड़े नहीं हैं. वे खुद को निष्पक्ष मानते हैं. लेकिन उनकी हर गतिविधि सत्ताधारी दल और विपक्ष, दोनों को प्रभावित करती है. उनकी रणनीति हमेशा दोनों तरफ दबाव बनाने की रही है.
विचारधारा और प्रेरणा
अन्ना हजारे के आंदोलन ने जरांगे को गहरा असर किया. अहिंसा और अनशन के जरिए संघर्ष करना उनका पसंदीदा तरीका है. वे हमेशा संविधानिक और शांतिपूर्ण रास्ता अपनाने पर जोर देते हैं.
संपत्ति और जीवनशैली
जरांगे के पास औसत स्तर की कृषि जमीन है. उनका जीवन सादगीपूर्ण और ग्रामीण परिवेश से जुड़ा हुआ है. न बड़े घर का शौक, न गाड़ियों का काफिला-वे खेतों और सामान्य लोगों के बीच रहने वाले नेता हैं.
रोचक तथ्य
कभी सीमित दायरे तक जाने जाने वाले जरांगे, अब सोशल मीडिया और मीडिया कवरेज की वजह से पूरे महाराष्ट्र में चर्चित हैं. उनके हर आंदोलन की घोषणा राजनीति की दिशा तय कर देती है. लोग उन्हें “गांव से उभरा नेता” कहते हैं.

आंदोलनों के दौरान वे साधारण झोपड़ी या पंडाल में रहते हैं और जमीन पर सोते हैं, ताकि अपनी सादगी और संघर्ष का संदेश समाज तक पहुंचा सके.
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL























