'देश से ज्यादा ये BJP का...', स्वतंत्रता दिवस पर उद्धव गुट का निशाना
Maharashtra News: उद्धव ठाकरे गुट ने बीजेपी पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर निशाना साधा है. इस दौरान बीजेपी पर जमकर हमला बोला गया है.

भारत ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया. इस बीच उद्धव ठाकरे गुट ने बीजेपी पर निशाना साधा है. उद्धव गुट के अखबार 'सामना' में कहा गया, "देश का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया. देश से ज्यादा ये बीजेपी का ही स्वतंत्रता दिवस लगा. देश में अभी ऐसा माहौल है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से आखिरी बार तिरंगा फहराया है, यही लोगों की भावना है.
यूबीटी (उद्धव गुट) सांसद संजय राउत ने सामना के लेख में लिखा- प्रधानमंत्री मोदी के दिमाग में कब कौन-सी सनक आ जाए और वे किस विषय पर राजनीति करने लगें, ये कहा नहीं जा सकता. इस बार मोदी ने लाल किले से पहली बार ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगान का कार्यक्रम किया. उसके बाद ध्वजारोहण और फिर हमेशा वाला भाषण. ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगान के 150 साल पूरे होने के अवसर पर ये कार्यक्रम किया गया.
लेख में कहा गया, "वंदे मातरम्’ पर सिर्फ अपना ही अधिकार है, ऐसा मोदी और उनके लोग अभी दिखा रहे हैं. सच यह है कि 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ गाया था. कांग्रेस के राष्ट्रीय मंच से सबसे पहले ‘वंदे मातरम्’ गाया गया, लेकिन कांग्रेस ‘वंदे मातरम्’ गायन का विरोध करती है, ऐसा दुष्प्रचार बीजेपी लगातार करती रही है.
महाराष्ट्र: BJP विधायक का विवादित बयान, 'वंदे मातरम् नहीं तो पाकिस्तान...'
बीजेपी पर उद्धव गुट का निशाना
बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा गया, "आज भी बीजेपी और संघ से जुड़े मुसलमान ‘वंदे मातरम्’ को स्वीकार नहीं करते. लेकिन ठीकरा सारे मुसलमानों पर फोड़ा जाता है. ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगान को कानूनी संरक्षण देने के लिए गृह मंत्रालय ने संसद में ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक’ लाया. इस विधेयक के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के बराबर ही कानूनी संरक्षण मिला है.
लेख में आगे कहा गया कि ‘वंदे मातरम्’ का अपमान करने वालों को इस नए कानून के तहत सख्त कारावास और जुर्माने की सजा होगी, लेकिन ये विधेयक पेश करते समय और पास होते समय प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह संसद के सदन में मौजूद नहीं थे. ये ‘वंदे मातरम्’ का अपमान है और उन्हीं लोगों ने लाल किले पर ‘वंदे मातरम्’ गान का उत्सव मनाया.
पीएम मोदी को लेकर क्या कहा गया?
पीएम मोदी को लेकर कहा गया, "मोदी ने दिल्ली में गुलामी की सभी निशानियों को खत्म करने का फैसला किया है. ये उनकी सनक है. मोदी को पुराना भव्य संसद भवन गुलामी का प्रतीक लगता था. इसलिए इस ऐतिहासिक भव्य संसद भवन को ‘ताला’ लगाकर मोदी ने नया संसद भवन (लोकतंत्र का नया कत्लखाना) बनवाया."
दरअसल पुराने संसद भवन में ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम और गणतंत्र का इतिहास बना था. जब ये ब्रिटिश पार्लियामेंट था, तब इसी पार्लियामेंट पर हमारे क्रांतिकारियों ने बम फेंके थे, लेकिन मोदी को ये इतिहास मंजूर नहीं है और उन्होंने नया संसद भवन बनवा दिया. वो किसी बड़े बाड़े जैसा लगता है. मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर जिस ‘साउथ ब्लॉक’ इमारत में कल तक बैठते थे, वो इमारत भी उन्हें गुलामी का प्रतीक लगी और अब उन्होंने नया प्रधानमंत्री कार्यालय ‘सेवातीर्थ’ नाम से खोल दिया. इससे देश के जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ता.
इसमें आगे कहा गया, "मुगलों और अंग्रेजों द्वारा बनाई गई कई इमारतें मोदी तोड़ रहे हैं और सड़कों, चौराहों के नाम बदल रहे हैं. भूकंप में बड़ी इमारतें गिरकर मिट्टी का ढेर हो जाएं, ऐसी हालत मोदी ने दिल्ली की कर दी है. लेकिन जिस लाल किले का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने किया था, उसी लाल किले से मोदी स्वतंत्रता दिवस का ध्वजारोहण करते हैं और ‘वंदे मातरम्’ गान का समारोह भी करते हैं. लाल किला उन्हें गुलामी का प्रतीक नहीं लगता."
यह भी कहा गया कि शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लाते समय लाल किला और शाहजहानाबाद शहर बसाया था. इस किले का असली नाम ‘किला-ए-मुबारक’ था. उसी लाल किले से मोदी पिछले दस-बारह साल से स्वतंत्रता दिवस का तिरंगा फहरा रहे हैं और जनता को उबा देनेवाले लंबे-लंबे भाषण दे रहे हैं. ऐसे में मोदी को लाल किले के बजाय स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए कोई दूसरा किला बनवाना चाहिए, लेकिन अब उतना समय उनके पास बचा नहीं है. मोदी दिल्ली का स्वरूप बदलने निकले हैं और जनता मोदी को ही बदलने निकली है, ऐसी तस्वीर नजर आ रही है.
'मोदी-शाह का 'वंदे मातरम्' प्रेम सिर्फ ढोंग'
'सामना' में कहा गया है कि मोदी-शाह और उनके लोगों का ‘वंदे मातरम्’ प्रेम सिर्फ ढोंग है. स्वतंत्रता दिवस के दिन ही जिन्होंने अपने घरों पर काले झंडे लगाए और स्वतंत्रता के बाद ५२ साल तक जिन्होंने तिरंगा नहीं फहराया, वही लोग आजादी और ‘वंदे मातरम्’ पर प्रवचन दे रहे हैं, वो भी लाल किले से. मोदी-शाह के बस में होता तो उन्होंने ताजमहल, लाल किले पर भी बुलडोजर चला दिया होता. मोदी को अंग्रेजों की इमारतें नहीं चाहिए. वो गुलामी है, लेकिन प्रे. ट्रंप ने भारत को गुलाम बनाकर रखा है वो मंजूर है.
आगे कहा गया, "सोनिया गांधी इटली की हैं इसलिए मोदी उन पर गंदी भाषा में हमला करते हैं, लेकिन इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के लिए ‘मेलोडी’ चॉकलेट का डिब्बा लेकर जाते हैं. मोदी भारत में मुसलमानों से नफरत करते हैं, लेकिन मलेशिया, दुबई, सऊदी अरब, इंडोनेशिया देशों के मुस्लिम शासकों को उनके देश जाकर गले मिलते हैं. मोदी ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खिलाफ संसद में कानून लाते हैं, लेकिन ऐसे धर्मांतरण की डोर जहां से हिलती है उस अमेरिका के चरणों में खड़े रहते हैं."
वंदे मातरम् को लेकर बीजेपी पर निशाना
लेख में यह भी कहा, "मोदी गाय को गौमाता कहते हैं, लेकिन गायों का कत्ल करके ‘बीफ’ निर्यात करने वाली कंपनियों से बीजेपी के लिए चंदा वसूलते हैं. ये ढोंग है और वही ढोंग वो ‘वंदे मातरम्’ के मामले में कर रहे हैं. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचे गए इस मूल गीत में कुल छह पद हैं. ये गीत उनके ‘आनंदमठ’ उपन्यास (1882) में शामिल है. इस गीत की पहली दो पंक्तियों को राष्ट्रगान के रूप में 1937 में कांग्रेस ने और बाद में भारतीय संविधान ने स्वीकार किया.
पहले दो पदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और समृद्धि का वर्णन है; लेकिन बीजेपी को ये कैसे मंजूर होगा? उन्होंने 2026 से सभी सरकारी कार्यक्रमों में संपूर्ण छह पंक्तियों को अनिवार्य कर दिया. इसके लिए वैसा कानून भी लाया. लगभग 3 मिनट 10 सेकंड की ये छह कड़ियां. इतना लंबा राष्ट्रगान दुनिया के किसी भी देश का नहीं होगा.
इसमें यह भी कहा गया है कि स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी फांसी पर चढ़े तो सिर्फ ‘वंदे मातरम्’ के दो शब्दों का उद्घोष करते हुए. इन दो शब्दों में जबरदस्त ऊर्जा है. ‘वंदे मातरम्’ की छह पंक्तियां गाते हुए वो फांसी पर नहीं चढ़े. स्वयं मोदी, अमित शाह आदि लोग ‘टेलीप्रॉम्प्टर’ के बिना क्या ‘वंदे मातरम्’ की छह पंक्तियां बिना गलती के गाकर दिखाएंगे? सच में गाकर दिखाएंगे क्या? क्रांतिकारियों ने जैसे ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करते हुए प्राणों की आहुति दी, वैसे ही एक और नारा था, ‘इंकलाब जिंदाबाद!’ क्रांति अमर है, इसका सीधा अर्थ यही है.
हसरत मोहानी जिक्र करते हुए लेख में लिखा गया, "उर्दू कवि और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 में ये नारा दिया और बाद में शहीद भगतसिंह और उनके साथियों ने इसे आजादी के नारे के रूप में लोकप्रिय किया. अब ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के जनक मौलाना हसरत मोहानी हैं इसलिए मोदी इस पर भी बैन लगा देंगे और ये नारा देते हुए भगतसिंह फांसी पर च़ढ़ गए, इसलिए इसे गुलामी का प्रतीक बताकर इतिहास की किताबों से भगतसिंह को हटाने का आदेश दे देंगे. सरकार को देशभक्ति की अपेक्षा अपना नया इतिहास लिखने और उसके राजनीतिक उत्सव समारोह मनाने में ज्यादा दिलचस्पी है.
'वंदे मातरम् एक प्रेरणा और चेतना थी'
'सामना' के लेख के आखिर में लिखा, "‘वंदे मातरम्’ एक प्रेरणा और चेतना थी और हमेशा रहेगी. ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय जनता पर जो गुलामी लादी थी, उसके खिलाफ ‘वंदे मातरम्’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ ने आग लगा दी थी. आज देश में वही सौ साल पहले वाली स्थिति पैदा हो गई है. ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’ गाने वाले बच्चों पर लाठियां और पैलेट गन चलाई गईं, वो भी देश की राजधानी में. ये ज्यादातर बच्चे भगतसिंह की ही उम्र के थे."
पूरा वंदे मातरम् चलने पर सोनिया गांधी नाराज? CM फडणवीस बोले- 'ये दिमागी नक्सलवाद...'





















