अजित पवार के लिए रोहित ने लिखी भावुक पोस्ट, कहा- आपसे शिकायत है दादा...
NCP शरद गुट के नेता रोहित पवार ने दिवंगत अजित पवार के अंतिम संस्कार के दूसरे दिन सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट लिखी.

राष्ट्रवादी शरद पवार गुट के विधायक रोहित पवार ने अपने चाचा अजित पवार के लिए एक इमोशनल पोस्ट लिखी है. रोहित पवार ने अपनी लिखा कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि अजित की राख को वहीं समेटना पड़ेगा जहां उन्होंने विकास के फूलों का बगीचा लगाया था.
सोशल मीडिया साइट एक्स पर पवार ने लिखा कि अजित दादा ने जहां विकास रूपी फूलों की बगिया खिलाई, वहीं उनकी अस्थियाँ समेटने की नौबत आएगी, ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोचा था. लेकिन नियति के क्रूर खेल के आगे किसी का कुछ नहीं चलता. अजित दादा के उस दुर्भाग्यपूर्ण समाचार के आने के बाद से अब तक दिमाग सुन्न है. मन बर्फ की तरह जम गया है. क्या हुआ, कैसे हुआ और क्यों हुआ-इन सवालों का तूफान मन में थमने का नाम नहीं ले रहा. अब तक हमारे बीच जो-जो बातें हुईं, चर्चाएँ हुईं, खासकर पिछले कुछ दिनों की भावनात्मक बातचीत-सब कुछ किसी टेप रिकॉर्डर की तरह बार-बार कानों में गूंज रहा है.
मानो आप ही अदृश्य रूप में बोल रहे- रोहित
उन्होंने लिखा कि ऐसा महसूस होता है मानो आप ही अदृश्य रूप में बोल रहे हों. आपकी काम करने की शैली, प्रशासन पर मजबूत पकड़, राजनीति पर गहरी कमांड, स्पष्ट स्वभाव, हां को हां और ना को ना कहने की साफगोई, सामने वाले के साथ राजनीति न खेलकर साफ बात करने का तरीका, काम की रफ्तार, समय की पाबंदी-इन सबका हमें सचमुच गर्व भी था और आश्चर्य भी होता था. सत्ता में रहें या न रहें, आपका प्रभाव हमेशा बना रहता था, एक सम्मानजनक भय भी महसूस होता था. आपका सार्वजनिक व्यक्तित्व देखकर जो लोग आपसे नहीं मिले थे, उन्हें आप कटहल की तरह बाहर से सख्त लगते थे, लेकिन जो एक बार आपके संपर्क में आया, उसने उसी कटहल के मीठे रस की तरह आपके स्वभाव को महसूस किया और आपका दीवाना हो गया-इसके हम गवाह हैं.
एनसीपी (शप) नेता ने लिखा कि लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ? दो दिन पहले तक महाराष्ट्र की बागडोर संभालने वाला, रोज सैकड़ों लोगों से मिलकर उनकी मदद करने वाला, सुबह से रात तक सिर्फ महाराष्ट्र के विकास के बारे में सोचने वाला, आम आदमी के लिए हवा की रफ्तार से दौड़ने वाला पहाड़ जैसा मजबूत इंसान एक पल में कैसे चला गया? इस सवाल ने दिमाग को चकरा दिया है. कहते हैं कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते. शायद अजित दादा के विकास की रफ्तार ही नियति को पसंद आ गई होगी और इसलिए जब वे लोगों के लिए दौड़ रहे थे, उसी वेग से नियति ने उन पर झपट्टा मारा होगा. उसी नियति से मेरी शिकायत है. लेकिन यह शिकायत कहां करूँ, समझ नहीं आता. मेरा उस नियति से सवाल है-“हम जैसे लाखों लोगों को ले जाती तो भी चलता, लेकिन हमारे लाखों का सहारा तुमने क्यों छीन लिया? एक ही पल में तुमने लाखों लोगों के लाखों सपनों को राख क्यों कर दिया? जवाब दो.'
'आपको कसकर गले लगाना है...'
पवार ने लिखा कि अजित दादा, आपसे भी मेरी शिकायत है. दो दिनों से महाराष्ट्र स्तब्ध है. हर आंख में आंसुओं का सैलाब थम नहीं रहा. सिसकियाँ और विलाप सुनकर कलेजा कांप उठता है. आपके जाने से पीछे इतना दुख का सागर उमड़ेगा, इसकी चिंता आपने क्यों नहीं की? जब कोई जरा सी भी गलती करता था तो आप उसे सबके सामने डांट देते थे, तो उसी सख्त आवाज में आपने नियति को क्यों नहीं डांटा? महाराष्ट्र के अभी कितने काम बाकी थे, फिर बिना समय दिए वह कैसे आ गई? दादा, आपकी आवाज सुनकर वह जरूर डर जाती. लेकिन आपने उसे भी नाराज नहीं किया. आए हुए हर व्यक्ति का काम करना-यही तो आपकी खासियत थी. लेकिन दो दिनों से दुख के सागर में डूबे महाराष्ट्र को देखकर अब उस नियति को भी जरूर पछतावा हो रहा होगा.
उन्होंने लिखा कि दादा, क्या कहूँ? आज आपकी अस्थियाँ इकट्ठी करते समय मन में लग रहा था कि फीनिक्स पक्षी की तरह आप इन्हीं राखों से फिर उसी शान से खड़े हो जाएंगे और अपनी भारी आवाज में कहेंगे-“अरे पागलों, क्यों आंसू बहा रहे हो? मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था. किसी संकट का सामना करने की तुम्हारी तैयारी कितनी है, यह ‘मॉक ड्रिल’ की तरह देख रहा था. अब उठो, काम पर लगो. महाराष्ट्र और यहां के आम लोगों के लिए हमें बहुत काम करना है. चलो, देर मत करो.' दादा. कहां खो गए आप? आपको कसकर गले लगाना है.
















