Maharashtra: 34 साल बाद परिवार से मिली मानसिक बीमारी से पीड़ित महिला, जानें- कैसे हुआ यह संभव?
Maharashtra News: 34 साल से लापता सोहिदा बीबी को मानसिक अस्पताल में इलाज के बाद उनके परिवार से मिलाया गया. श्रद्धा फाउंडेशन और डॉक्टरों की टीम ने पहचान और पुनर्मिलन में अहम भूमिका निभाई.

Maharashtra Latest News: असम के कोकराझार जिले में 14 मई का दिन एक बेहद भावुक पल लेकर आया. इस दिन अब्दुल कादर फकीर (61) को अपनी 34 साल से लापता बहन से दोबारा मिलने का मौका मिला. 34 सालों तक गुमनामी में रहने के बाद असम की सोहिदा बीबी आखिरकार अपने परिवार से मिल गईं.
'द इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक यह पुनर्मिलन न केवल मानवीय संवेदना की मिसाल बना, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक संगठनों की अहम भूमिका को भी उजागर करता है.
मानसिक बीमारी स्किजोफ्रेनिया के कारण परिवार से बिछड़ीं
सोहिदा बीबी की कहानी 1990 के दशक की शुरुआत से शुरू होती है, जब शादी के बाद उन्हें गंभीर मानसिक बीमारी स्किजोफ्रेनिया का सामना करना पड़ा. बीमारी के चलते उन्हें पहले गुवाहाटी और फिर महाराष्ट्र के ठाणे मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनका मानसिक स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया और 1998 में आर्थर रोड जेल से उन्हें अदालत के आदेश पर इलाज के लिए ठाणे मानसिक अस्पताल स्थानांतरित किया गया.
7 साल तक इलाज के बाद भी नहीं हुईं ठीक
सोहिदा का इलाज वर्षों तक चला, लेकिन 7 साल के लंबे उपचार के बावजूद डॉक्टरों ने उन्हें डिस्चार्ज करने के लिए मानसिक रूप से फिट नहीं माना. वे धीरे-धीरे अस्पताल की दिनचर्या का हिस्सा बन गईं और उनकी पहचान धुंधली होती गई. परिवार से संपर्क टूट गया और वह समाज से लगभग गायब हो चुकी थीं.
श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन का रहा योगदान
यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. ठाणे मानसिक अस्पताल के डॉक्टरों और श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन की टीम ने मिलकर सोहिदा की पहचान फिर से खोजने की कोशिश शुरू की. अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. अर्चना गडकरी के अनुसार, "जब उन्हें अस्पताल लाया गया था, तब वह काफी आक्रामक थीं. न वो बात कर सकती थी और न ही खुद की देखभाल, उन्हें नींद की भी समस्या थी."
समय के साथ कुछ आपराधिक आरोप हटाए गए और उन्हें 'अपराधी' से 'नागरिक मरीज' का दर्जा दिया गया. बातचीत के दौरान उन्होंने धीरे-धीरे बंगाली भाषा में बात करना शुरू किया, जिससे उनकी जड़ों का पता चला. यह छोटी सी भाषा की कड़ी एक बड़े पुनर्मिलन का रास्ता बन गई.
संस्था के संस्थापक डॉ. भरत वाटवानी और उनकी टीम ने स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाई और अंततः सोहिदा के परिवार को असम के उनके पैतृक गांव में खोज निकाला. 14 मई को एक भावुक दृश्य देखने को मिला, जब सोहिदा बीबी अपने भाई अब्दुल कादिर फकीर के घर पहुंचीं. भाई ने भावुक होते हुए कहा, "मेरी बहन अब मेरे पास ही रहेगी."
श्रद्धा फाउंडेशन अब तक 7,000 से अधिक मानसिक रूप से बीमार लोगों को उनके परिवारों से मिलवा चुकी है. सोहिदा की घर वापसी सिर्फ एक पुनर्मिलन नहीं, बल्कि समाज के लिए यह एक संदेश है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को भी गरिमा और अपनापन मिलना चाहिए.
Source: IOCL























