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महाराष्ट्र की सियासत में अब नहीं दिखेगी चाचा-भतीजे की जोड़ी! अजित पवार के निधन से राजनीति पर बड़ा असर

Ajit Pawar Death in Baramati Plane Crash: बारामती विमान हादसे में अजित पवार के निधन की पुष्टि हुई। उनके और शरद पवार के रिश्ते राजनीति में सहयोग, टकराव और अलग राहों की कहानी रहे.

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बारामती के पास हुए एक विमान हादसे में निधन हो गया. बताया गया कि विमान में सवार सभी यात्रियों की मौत हो गई. अजित पवार एक जनसभा को संबोधित करने बारामती जा रहे थे. महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार और शरद पवार की चाचा–भतीजे की जोड़ी लंबे समय तक मजबूत मानी जाती रही. शरद पवार ने अजित को राजनीति में स्थापित किया, लेकिन सत्ता संघर्ष के चलते रिश्तों में दरार आई. 2019 और 2023 की राजनीतिक घटनाओं ने दोनों को अलग खेमों में खड़ा कर दिया.

महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार और अजित पवार का नाम लंबे समय तक साथ लिया जाता रहा. शरद पवार ने अजित पवार को राजनीति में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई.

शुरुआती दौर में अजित पवार को शरद पवार का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाने लगा था. दोनों के बीच गुरु-शिष्य जैसा रिश्ता था. शरद पवार का अनुभव और अजित पवार की आक्रामक राजनीति, यह मेल पार्टी के लिए फायदेमंद माना जाता था.

बारामती से सत्ता तक का सफर

अजित पवार ने अपनी पहचान मेहनत और राजनीतिक समझ से बनाई. 1995 में वे पहली बार बारामती विधानसभा सीट से विधायक बने और इसके बाद लगातार कई चुनाव जीतते चले गए.

बारामती उनकी सियासत का केंद्र रही. स्थानीय मुद्दों से लेकर राज्य स्तर की राजनीति तक, अजित पवार ने खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया. यही वजह रही कि वे कई बार उपमुख्यमंत्री बने और सत्ता के सबसे अहम चेहरों में गिने गए.

2019 में दरार आई सामने

रिश्तों में सबसे बड़ा मोड़ 2019 में आया. जब अजित पवार ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश की, तो यह कदम शरद पवार की राजनीतिक सोच के बिल्कुल उलट माना गया.

इस घटनाक्रम के बाद चाचा-भतीजे के रिश्ते में आई दरार खुलकर सामने आ गई. पार्टी के भीतर और बाहर यह साफ दिखने लगा कि दोनों अब एक ही लाइन पर नहीं चल रहे.

2023 में पार्टी दो खेमों में बंटी

साल 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी औपचारिक रूप से दो धड़ों में बंट गई. अजित पवार अपने समर्थकों के साथ सत्ता पक्ष में शामिल हो गए, जबकि शरद पवार ने विपक्ष में रहते हुए अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना. यहीं से “साथ” की राजनीति “अलग–अलग रास्तों” में बदल गई. एक तरफ सत्ता में भागीदारी की राजनीति, तो दूसरी तरफ वैचारिक लड़ाई.

सोच का फर्क, सियासत की दिशा

समय के साथ दोनों नेताओं की सोच में फर्क साफ नजर आने लगा. शरद पवार पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष राजनीति और विपक्ष की भूमिका पर जोर देते रहे. वहीं अजित पवार व्यावहारिक राजनीति और सत्ता-साझेदारी के समर्थक दिखे. एनडीए के साथ गठबंधन को लेकर मतभेदों ने पार्टी के भीतर खाई को और गहरा कर दिया. यही फर्क आगे चलकर अलगाव की बड़ी वजह बना.

निजी रिश्ते बनाम राजनीतिक टकराव

राजनीतिक मतभेदों के बावजूद निजी रिश्तों में पूरी तरह कटुता की तस्वीर कभी सामने नहीं आई. सार्वजनिक मंचों पर जहां तीखे बयान दिखे, वहीं व्यक्तिगत स्तर पर शिष्टाचार बनाए रखने की बातें भी सुनने को मिलीं. कई मौकों पर दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान दिखाया, जिससे यह संदेश गया कि लड़ाई विचारों की है, रिश्तों की नहीं.

नजदीकियों की अटकलें

हाल के समय में स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान दोनों गुटों के बीच नजदीकियों की चर्चाएं तेज हुई थीं. जिला परिषदों और नगर निगम चुनावों में सहयोग के संकेत मिले. पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे इलाकों में साझा रणनीति की खबरों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या चाचा-भतीजे फिर से साथ आ सकते हैं? राजनीतिक गलियारों में इस पर लगातार चर्चा चलती रही. लेकिन फिर से चाचा-भतीजे का साथ आने सपना अजित पवार की मौत के साथ ही अधूरा रह गया.

एक रिश्ते का अधूरा अध्याय

इस हादसे की खबर के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा अध्याय अधूरा रह गया, जिसमें सत्ता, संघर्ष, रिश्ते और समझौते सब कुछ था. अजित पवार और शरद पवार का रिश्ता सिर्फ पारिवारिक नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय करने वाला रहा है. साथ से अलगाव तक का यह सफर आने वाले वर्षों तक सियासी बहसों का हिस्सा बना रहेगा.

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