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Indore News: गौतमपुरा के हिंगोट युद्ध पर हुआ अहम फैसला, इस बार दीपावली के तीसरे दिन होगा आयोजन

इंदौर में दीपावली के अगले दिन होने वाले हिंगोट युद्ध इस दिवाली के तीसरे दिन होगा. यह फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि दिवाली के अगले दिन सूर्य ग्रहण है.

MP News: इंदौर में दीपावली के दूसरे दिन गौतमपुरा नगर में होने वाला हिंगोट युद्ध इस बार सूर्य ग्रहण के कारण दीपावली के तीसरे दिन यानी 26 अक्टूबर को होगा. इस दिन भाई दूज पड़ रहा है. इसको लेकर प्रशासन ने भी अनुमति दे दी है और प्रशासन द्वारा सुरक्षा के इंतेजाम किए जा रहे हैं. युद्ध मैदान के निरीक्षण के लिए अपर कलेक्टर, एसपी, एसडीएम और अन्य अधिकारी हर दिन गौतमपुरा पहुच रहे हैं. दरअसल, हिंगोट युद्ध इस बार दीपावली के तीसरे दिन यानी 26 अक्टूबर को खेला जाएगा.

24 अक्टूबर को दीपावली मनाई जा रही है. वहीं 25 अक्टूबर को सूर्य ग्रहण है, मान्यता के अनुसार सूर्य ग्रहण के कारण सूतक लगने से सभी मंदिरों के पट (द्वार) बंद रहेंगे. कोई भी पूजा अर्चना इस दौरान नहीं होंगे और हिंगोट युद्ध की परंपरा रही है कि मैदान के पास ही देवनारायण भगवान के मंदिर पर जाकर सभी योद्धा उनके दर्शन करते हैं उसके बाद ही हिंगोट मैदान में उतरते हैं. ऐसे में हिंगोट युद्ध भी 25 अक्टूबर को होना सम्भव नहीं है. इसलिए 26 अक्टूबर को यह आयोजन होगा.

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इंदौर जिले में आने वाले गौतमपुरा का हिंगोट युद्ध प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में विख्यात है. यह हिंगोट युद्ध दिवाली के दूसरे दिन होता है, लेकिन योद्धा इस बार सूर्य ग्रहण के कारण दीपावली के तीसरे दिन भाई दूज की शाम को आयोजित होगा. अति प्राचीन परंपरा हिंगोट (अग्निबाण) युद्ध की तैयारी लगभग पूर्ण कर चुके हैं. इस परंपरागत युद्ध बनाम खेल में न किसी की हार होती है और न किसी की जीत बस ये युद्ध भाईचारे का युद्ध होता है. जहां तुर्रा (गौतमपुरा) और कलंगी (रूणजी) नाम दो दल अपने पूर्वजों द्वारा दी गई इस पारंपरिक धरोहर को जीवित रखने के लिए एक महीने पहले नवरात्र से ही हिंगोट बनाने की प्रक्रिया में जुट जाते हैं और दीपावली के दूसरे दिन पड़वा को अपनी इस अद्वितीय परंपरा को जीवित रखते हैं, लेकिन इस बार पडवा को सूर्य ग्रहण का सूतक होने से यह परम्परा दीपावली के तीसरे दिन यानी 26 अक्टूबर के दिन होगी.

पुलिस के अधिकारी रहेंगे मौके पर मौजूद
हिंगोट युद्ध के दिन तुर्रा और कलंगी दल के योद्धा सिर पर साफा, कंधे पर हिंगोट से भरे झोले हाथ में ढाल और जलती लकड़ी लेकर दोपहर दो बजे बाद हिंगोट युद्ध मैदान की और नाचते गाते निकल पड़ते हैं. मैदान के समीप भगवान देवनारायण मंदिर में दर्शन के बाद मैदान में आमने सामने खडे हो जाते हैं और शाम संकेत पाते युद्ध आरंभ कर देते हैं. करीब दो घंटे तक चलने वाले इस युद्ध में सामने वाले योद्धा द्वारा फेंके गये हिंगोट की चपेट मे आये योद्धा का झोला जलता है, कई योद्धा घायल भी होते हैं. वहीं दिशा हिन हिंगोट दिशाहीन होकर दर्शकों में घुस जाता है तो दर्शक भी चोटिल हो जाते हैं. वहीं रात्रि में हिंगोट से निकलने वाली अग्नि रेखाएं आसमान मे खीच जाती है जो मनोहर दृश्य पैदा करती है. हिंगोट युद्ध को लेकर प्रशासन ने भी पूरी तरीके से कमर कस ली है. प्रशासन द्वारा एतियातन के तौर पर फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस की भी व्यवस्था की है. वहीं पुलिस और प्रशासन के कई अधिकारी भी मौके पर मौजूद रहेंगे.

कोर्ट में दायर की गई थी याचिका
हिंगोट हिंगोरिया नामक पेड़ पर पैदा होता है. जिसे यहां के नागरिक जंगल में पहुंचकर पेड़ से तोड़कर लाते हैं. नींबू आकार नुमा फल जो ऊपर से नारियल के समान कठोर और अंदर खोखला गुदे से भरा हुआ होता है. जिसे ऊपर से साफ कर एक छोर पर बारीक और दूसरे पर बड़ा छेद किया जाता है. दो दिन धुप में रखने के बाद योद्धा द्वारा तैयार किया किया जाता है. गौरतलब है कि इस हिंगोट (अग्निबाण) युद्ध में हर बार कई योद्धाओं सहित दर्शक भी जख्मी हो जाते हैं पिछले कुछ साल पहले एक योद्धा अपनी जान भी गंवा चुका है.

वहीं सन् 2015 के बाद इस युद्ध को बंद करने के लिए कोर्ट में जनहित याचिका भी लगाई गई. बाद में कोर्ट ने परंपरा को निभाने की बात तो कही पर अभी भी इस पर परिणाम नहीं हो सका है. इन सभी उलझनों के बाद अब योद्धाओं को इस वर्ष और दिक्कत आ रही है. दो साल कोरोना काल के कारण गिने चुने योद्धा ही सांकेतिक रूप से परम्परा निभा सकें थे. हिंगोट युद्ध के इतिहास बस इतना है कि यह गौतमपुरा और रुणजी नगर वासियों की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा है जिसे यहां के नागरिक अपने पूर्वजों की धरोहर समझ कर प्रति वर्ष इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं.

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