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Kashmir News: कश्मीर में आई दुनिया की 'मिल्क क्वीन', 7 लीटर दूध देती है स्विस बकरी 'सानेन'

Saanen Goat in Kashmir: कश्मीर में अब सानेन बकरी 'दूध की रानी' के नाम से डेयरी क्रांति लाने को तैयार है. SKUAST-K द्वारा लाई गई यह नस्ल, जिसे महात्मा गांधी ने 'गरीब आदमी की गाय' कहा था.

स्विट्जरलैंड की मशहूर सानेन (Saanen) बकरी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने "गरीब आदमी की गाय" का नाम दिया था, अब कश्मीर घाटी में एक नई डेयरी क्रांति लाने के लिए तैयार है. शेर-ए-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय (SKUAST-K) के वैज्ञानिकों ने किसानों की आय और दूध उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से दुनिया भर में 'दूध की रानी' (Milk Queen) के नाम से मशहूर इस बकरी को कश्मीर में पेश किया है.

विश्वविद्यालय के शुहामा स्थित माउंटेन रिसर्च सेंटर (MRCS&G) में इस नस्ल को औपचारिक रूप से लाया गया है. मुख्य प्रोजेक्ट वैज्ञानिक डॉ. परवेज़ अहमद रेशी ने बताया कि पहले चरण में 7 से 8 महीने की उम्र वाली 20 मादा और 4 नर सानेन बकरियां स्विट्जरलैंड से खरीदी गई हैं. डॉ. रेशी ने पुष्टि की है कि यह पहली बार है जब भारत के किसी सरकारी संस्थागत ढांचे में इस नस्ल को शामिल किया गया है.

महात्मा गांधी से है ऐतिहासिक नाता

इस बकरी की उत्पत्ति स्विट्जरलैंड की सानेन घाटी से हुई है. भारत में इसका एक खास ऐतिहासिक महत्व है, क्योंकि महात्मा गांधी ही सबसे पहले इसे भारत लाए थे. इसकी कम लागत और ज्यादा दूध देने की क्षमता को देखते हुए ही बापू ने इसे 'गरीब आदमी की गाय' कहा था. यह बकरी गाय की तरह ही रोजाना 3 से 7 लीटर तक दूध देती है.

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शहरी इलाकों और छोटी जगहों के लिए वरदान

कश्मीर के शहरी इलाकों में एक गाय (500-600 किलो वजन) पालना, उसे भारी मात्रा में चारा और जगह देना एक मुश्किल काम है. इसके उलट, एक पूरी तरह से बड़ी सानेन बकरी का वजन सिर्फ 50 से 60 किलो होता है. इसे रोजाना सिर्फ 1 से 2 किलो सूखी घास और थोड़ा सा कंसंट्रेट चारा चाहिए. इसे छोटे पिंजरे या घर की छोटी सी जगह में भी आसानी से पाला जा सकता है और यह एक औसत कश्मीरी परिवार के दूध की जरूरत पूरी कर सकती है.

बदबू रहित पौष्टिक A2 दूध और शांत स्वभाव

सानेन बकरी का दूध 'A2 दूध' श्रेणी में आता है, जो देसी गाय के दूध के समान ही पौष्टिक और महंगा होता है. स्थानीय बकरियों के उलट, इसके दूध में कोई खास गंध नहीं होती, जो अक्सर लोगों को बकरी का दूध पीने से रोकती है. यह दूध पचने में आसान, एलर्जी-फ्री और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए बेहद फायदेमंद है. इसके अलावा, यह नस्ल बेहद शांत और सौम्य स्वभाव की होती है, जिससे इसे पालना सुरक्षित और आसान है.

किसानों तक पहुंचने से पहले होगा 3 साल का शोध

विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि तुरंत इन बकरियों को किसानों को नहीं सौंपा जाएगा. कश्मीर की जलवायु में इस विदेशी नस्ल के प्रदर्शन का बारीकी से अध्ययन करने के लिए 2 से 3 साल का गहन शोध कार्यक्रम चलाया जाएगा. इसके सफल होने के बाद ही इसे बड़े पैमाने पर किसानों और बेरोजगार युवाओं को रोजगार (उद्यमिता) के अवसर प्रदान करने के लिए बांटा जाएगा.

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