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दिल्ली: JNU के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ने VC के खिलाफ आयोग में की शिकायत, पढ़ें पूरा मामला

Delhi News: जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष धनंजय ने कुलपति शांतिश्री डी. पंडित के बयान को दलित विरोधी बताया. उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत दर्ज कराई. साथ ही कार्रवाई की मांग की.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष धनंजय ने विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर शांति‍श्री डी. पंडित के खिलाफ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है. उन्होंने आरोप लगाया है कि कुलपति द्वारा एक सार्वजनिक मंच पर दिए गए बयान से दलित समुदाय के खिलाफ वैमनस्य, घृणा और दुर्भावना फैलाने का काम हुआ है.

धनंजय, जो जेएनयू के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स के पीएचडी शोधार्थी भी हैं. उन्होंने अपनी शिकायत में कहा है कि यह बयान अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है. शिकायत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष को संबोधित की गई है.

सार्वजनिक पॉडकास्ट में दिया गया बयान

शिकायत के अनुसार, 16 फरवरी 2026 को प्रो. शांति‍श्री पंडित एक ऑनलाइन पॉडकास्ट कार्यक्रम में शामिल हुई थीं, जो 'द संडे गार्जियन' नामक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित हुआ। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026' विषय पर चर्चा की जा रही थी जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को संबोधित करना बताया गया था.

शिकायत में उल्लेख है कि कार्यक्रम के दौरान प्रो. पंडित ने दलित समुदाय को लेकर 'स्थायी पीड़ित मानसिकता' (permanent victimhood) जैसी टिप्पणी की. शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने कहा कि आप स्थायी रूप से पीड़ित बने रहकर आगे नहीं बढ़ सकते और इसे 'ब्लैक्स' के संदर्भ में दिए गए उदाहरण से जोड़ते हुए दलित समुदाय पर लागू बताया. धनंजय का आरोप है कि यह बयान दलितों के ऐतिहासिक संघर्ष और उनके साथ हुए भेदभाव को कमतर आंकता है और सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देता है.

शिकायत में लगाए गए मुख्य आरोप

धनंजय ने अपनी शिकायत में कहा है कि किसी सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा इस प्रकार का बयान देना अत्यंत गंभीर है. उन्होंने लिखा है कि कुलपति विश्वविद्यालय की सर्वोच्च प्रशासनिक पदाधिकारी होती हैं और उनके बयान का छात्रों और समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है. शिकायत के अनुसार, इस बयान के बाद दलित और अन्य वंचित समुदाय के छात्रों के बीच असुरक्षा और मानसिक तनाव का माहौल बना है. शिकायत में दावा किया गया है कि ऐसे वक्तव्यों से परिसर का वातावरण प्रभावित हुआ है और कुछ छात्रों ने उत्पीड़न की घटनाओं की भी शिकायत की है.

धनंजय ने यह भी कहा है कि संविधान के मूल सिद्धांतों और सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत इस प्रकार की टिप्पणी न केवल आपत्तिजनक है. बल्कि यह एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(u) के तहत दंडनीय है. साथ ही उन्होंने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 196 और 197 का भी उल्लेख किया है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

शिकायत में सर्वोच्च न्यायालय के एक हालिया निर्णय का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि किसी भी समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने या उन्हें अपमानित करने का प्रयास आपराधिक कृत्य माना जाएगा और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए. धनंजय ने तर्क दिया है कि कुलपति का बयान ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय के खिलाफ पूर्वाग्रह को बढ़ावा देता है और सामाजिक सद्भाव को कमजोर करता है.

आयोग से की गई ये मांगें

शिकायत में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से कई मांगें की गई हैं. इनमें प्रमुख रूप से शिकायत पर संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करने का निर्देश देना, मामले की स्वतंत्र जांच के लिए समिति गठित करना, संबंधित प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देना, कुलपति के खिलाफ अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की सिफारिश करना, शिकायत में यह भी कहा गया है कि अब तक कुलपति की ओर से कोई सार्वजनिक माफी जारी नहीं की गई है, जिससे यह प्रतीत होता है कि बयान सोच-समझकर दिया गया था.

छात्र राजनीति में बढ़ी हलचल

इस शिकायत के सार्वजनिक होने के बाद जेएनयू परिसर और छात्र राजनीति में हलचल तेज हो गई है. छात्र संगठनों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा जारी है. कुछ संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है, जबकि अन्य का कहना है कि पूरे बयान को संदर्भ सहित देखा जाना चाहिए. फिलहाल राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की ओर से इस शिकायत पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. आयोग द्वारा मामले की प्रारंभिक जांच के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी.

धनंजय ने अपनी शिकायत के आखिर में आयोग से आग्रह किया है कि वह दलित समुदाय की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए त्वरित और निष्पक्ष हस्तक्षेप करें. अब देखना होगा कि इस मामले में आयोग क्या कदम उठाता है और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है.

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