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दिल्ली HC का अहम फैसला, 'सजा का मकसद सिर्फ बदला नहीं, सुधार भी'

Delhi News: कोर्ट ने कहा कि सजा का मकसद केवल बदला लेना नहीं है. इसमें अपराध की रोकथाम, समाज की सुरक्षा और दोषी के सुधार को भी ध्यान में रखना जरूरी है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने समय से पहले रिहाई यानी प्रीमैच्योर रिलीज को लेकर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी कैदी की रिहाई से समाज में न्याय व्यवस्था के खिलाफ गलत या नकारात्मक संदेश जाने की आशंका को रिहाई रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता. इसी तरह पीड़ित या गवाह की बिना ठोस आधार वाली आशंकाओं को भी निर्णायक नहीं माना जा सकता.

जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने कहा कि रिहाई के बाद कैदी के दोबारा अपराध करने की आशंका का आकलन उसके पुराने रिकॉर्ड और जेल में उसके मौजूदा आचरण के आधार पर होना चाहिए.

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31 साल जेल में रहा, 40 साल से ज्यादा हुई कुल सजा

कोर्ट के सामने दो उम्रकैद के कैदियों रमेश और तस्लीम की याचिकाएं थीं. दोनों की समय से पहले रिहाई की मांग को सेंटेंस रिव्यू बोर्ड कई बार खारिज कर चुका था. रमेश दुष्कर्म और गैर इरादतन हत्या के मामले में दोषी है. वह बिना रिमिशन के 31 साल से ज्यादा जेल में रह चुका है जबकि रिमिशन जोड़ने पर उसकी कुल हिरासत 40 साल से अधिक हो गई.

गैंगरेप के दोषी ने भी 15 साल से ज्यादा काटी सजा

दूसरा कैदी तस्लीम गैंगरेप के मामले में दोषी है. उसने बिना रिमिशन के 15 साल से ज्यादा जेल में बिताए हैं. रिमिशन जोड़ने पर उसकी कुल हिरासत 19 साल से अधिक हो गई. कोर्ट ने दोनों मामलों में SRB के फैसले और समय से पहले रिहाई से जुड़े नियमों की विस्तार से समीक्षा की.
अपराध कितना गंभीर था, यह हमेशा रिहाई रोकने का आधार नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि जिस अपराध में व्यक्ति दोषी ठहराया गया था उसकी गंभीरता और कोर्ट की ओर से दी गई सजा की अवधि को प्रीमैच्योर रिलीज तय करने में निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता. ये दोनों बातें पुरानी और स्थिर परिस्थितियां हैं, जिन्हें समय बीतने के साथ बदला नहीं जा सकता. अगर इन्हीं को आधार बनाकर हर बार रिहाई रोकी जाएगी तो समय से पहले रिहाई की पूरी व्यवस्था ही बेअसर हो जाएगी.

उम्रकैद को जेल में मौत तक सजा नहीं बना सकते

कोर्ट ने कहा कि सजा का मकसद केवल बदला लेना नहीं है. इसमें अपराध की रोकथाम, समाज की सुरक्षा और दोषी के सुधार को भी ध्यान में रखना जरूरी है. खासकर उम्रकैद के मामलों में अगर समय बीतने के साथ सजा का असर लगातार कठोर होता जाए तो यह उम्रकैद को जेल में मौत तक की प्रतिशोधात्मक सजा में बदलने जैसा होगा. इससे सुधार की नीति का मकसद ही खत्म हो जाएगा. 

कोर्ट ने साफ किया कि किसी गंभीर या जघन्य अपराध के दोषी को रिहा करने से समाज में न्याय व्यवस्था के खिलाफ गलत संदेश जाएगा यह अपने आप में रिहाई रोकने का वैध आधार नहीं है. कानून में तय कसौटियों के मुताबिक ही फैसला होना चाहिए न कि समाज में संभावित प्रतिक्रिया के डर से.

पीड़ित या गवाह की आशंका भी ठोस आधार पर हो- हाई कोर्ट

कोर्ट ने पीड़ितों और गवाहों की आशंकाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया लेकिन कहा कि बिना किसी ठोस सामग्री के केवल आशंका के आधार पर रिहाई नहीं रोकी जा सकती. अगर यह देखना है कि कैदी बाहर आने के बाद फिर अपराध कर सकता है या नहीं तो उसके पुराने रिकॉर्ड और जेल के दौरान उसके व्यवहार को देखा जाना चाहिए.

जेल में अच्छा आचरण सबसे बड़ा संकेत

हाईकोर्ट ने कहा कि दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में व्यक्ति का आचरण उसके सुधार का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक है. अगर उसके खिलाफ कोई नया और समकालीन नकारात्मक तथ्य सामने नहीं है तो लंबे समय तक जेल में रहा अच्छा आचरण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

खुली जेल तक पहुंचना भी अहम

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कैदी सामान्य जेल से सेमी-ओपन जेल और फिर अच्छे रिकॉर्ड के साथ ओपन जेल तक पहुंचा है तो यह उसके सुधार और जेल में अच्छे व्यवहार का महत्वपूर्ण संकेत है.  प्रीमैच्योर रिलीज पर फैसला लेते समय इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए. 

पुलिस की सिर्फ ना से रिहाई नहीं रोकी जा सकती

कोर्ट ने पुलिस की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. सिर्फ इस वजह से कि पुलिस ने रिहाई की सिफारिश नहीं की है, कैदी की रिहाई को खारिज नहीं किया जा सकता. पुलिस की आपत्ति के पीछे ठोस और विश्वसनीय सामग्री होनी चाहिए.  महज विरोध या सिफारिश न करना अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने SRB का फैसला मनमाना पाया

रमेश के मामले में कोर्ट ने पाया कि उसने 31 साल से ज्यादा वास्तविक कैद और रिमिशन समेत 40 साल से अधिक की हिरासत पूरी कर ली है. इसके बावजूद उसकी रिहाई बार-बार खारिज की गई.कोर्ट ने माना कि SRB का तरीका सरकार की अपनी नीति से मेल नहीं खाता.तस्लीम के मामले में भी कोर्ट ने पाया कि वह लागू दिशानिर्देशों के तहत पात्रता पूरी कर चुका था.इसके बावजूद SRB ने अपराध की गंभीरता, समाज में गलत संदेश जाने और न्याय व्यवस्था में लोगों के भरोसे को लेकर सामान्य आशंकाओं को आधार बनाया जबकि उसके जेल के अच्छे आचरण और अनुकूल रिपोर्टों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. 

हाईकोर्ट ने दोनों को तुरंत रिहा करने का दिया आदेश

हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में SRB के फैसलों को मनमाना और संविधान के आर्टिकल 21 का उल्लंघन माना.  कोर्ट ने कहा कि समय से पहले रिहाई का फैसला दोषी के मौजूदा आचरण, सुधार और रिहाई के बाद दोबारा अपराध करने के वास्तविक जोखिम को ध्यान में रखकर होना चाहिए.  इसके बाद कोर्ट ने रमेश और तस्लीम दोनों को तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया. 

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