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Explained: सोनम और अन्ना के एक ही हथियार, लेकिन दो अलग अंजाम... एक कामयाब और दूसरे की नाकामी की 5 बड़ी वजहें

Sonam vs Anna: अन्ना हजारे ने खुद सोनम वांगचुक के आंदोलन का समर्थन किया. अन्ना का समर्थन भी सोनम को वह ताकत नहीं दे सका, जो अन्ना के आंदोलन में थी. आंदोलन की ताकत नेता में नहीं, मुद्दे में होती है.

2011 में अन्ना हजारे ने 12 दिन की भूख हड़ताल से UPA सरकार को घुटनों पर ला दिया था. 2026 में सोनम वांगचुक ने 20 दिन से ज्यादा का उपवास किया, लेकिन सरकार ने उनकी तरफ देखने तक से इनकार कर दिया. दोनों का एक ही हथियार- भूख हड़ताल, लेकिन नतीजे बिल्कुल उलट. आंदोलन को करीब से देखने वाले हर उस शख्स के मन में एक ही सवाल है- आखिर ऐसा क्यों हुआ?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए हमें दोनों आंदोलनों की पांच अलग-अलग पहलुओं पर तुलना करनी होगी...

पहला अंतर: मांग- 'व्यापक' बनाम 'व्यक्तिगत'

अन्ना हजारे का आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था. एक ऐसा मुद्दा, जो हर भारतीय की रग-रग में बसा हुआ था. उनकी मांग थी कि जनलोकपाल बिल लाया जाए. एक ऐसा कानून जो हर भ्रष्ट नेता, हर भ्रष्ट अधिकारी पर लागू होता. मांग इतनी व्यापक थी कि उसमें हर कोई अपनी पीड़ा देख सकता था. इस आंदोलन ने पूरे देश को एकजुट किया.

सोनम वांगचुक की मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है. NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में खामियों को लेकर यह मांग भले ही जायज हो, लेकिन यह एक व्यक्ति को निशाना बनाती है. जनता के लिए यह 'हर किसी की लड़ाई' नहीं, बल्कि 'एक मंत्री के खिलाफ लड़ाई' बनकर रह गई.

इस बात का सबूत यह है कि आंदोलन के 23वें दिन सोनम वांगचुक की मांग में बड़ा बदलाव आ गया. उन्होंने अब मंत्री के इस्तीफे की जगह 'संसद में मुद्दा उठाने का आश्वासन' मांगना शुरू कर दिया. उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने भी यही बात दोहराई कि वे अपना अनशन तब खत्म करेंगे जब राजनेता अस्पताल आकर आश्वासन दें कि शिक्षा सुधार मानसून सत्र का केंद्रीय मुद्दा होगा. यानी मूल मांग ही बदल गई, जो किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी होती है.

दूसरा अंतर: मीडिया- 'लाइव टेलीविजन' बनाम 'मौन'

2011 में टेलीविजन चैनलों ने अन्ना के आंदोलन को लाइव कवर किया. हर शाम, हर सुबह, अन्ना की तस्वीर, उनकी आवाजत और उनकी भूख हड़ताल सब कुछ टीवी पर था. फिल्मी सितारों से लेकर आम जनता तक, सभी ने समर्थन जताया. इसी मीडिया कवरेज ने अन्ना को एक राष्ट्रीय प्रतीक बना दिया.

2026 में मीडिया कवरेज सीमित रही. राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने सोनम वांगचुक को हटाने को 'भारत के इतिहास की सबसे शर्मनाक करतूतों में से एक' बताया. जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस मौन पर सवाल उठाया.

सोशल मीडिया पर सोनम को जबरदस्त समर्थन मिला. 11 से 17 जुलाई   के बीच X पर 6.3 लाख से ज्यादा पोस्ट और 8.3 मिलियन से ज्यादा इंटरैक्शन हुए. Change.org पर 51 से अधिक याचिकाएं लॉन्च हुईं, जिन पर   2.5 लाख से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किए. गूगल पर 'Sonam Wangchuk' की खोज 'Weather today' से भी ज्यादा रही.

तीसरा अंतर: राजनीतिक माहौल- 'कमजोर UPA' बनाम 'मजबूत NDA'

2011 में UPA-2 सरकार कमजोर थी. 2G स्पेक्ट्रम घोटाला और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला भ्रष्टाचार के मामले लगातार सामने आ रहे थे. आम जनता में भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा अपने चरम पर था. बीजेपी ने खुलेआम अन्ना का समर्थन किया. अन्ना के आंदोलन ने इस गुस्से को ईंधन दिया.

2026 में NDA सरकार मजबूत है. प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और भरोसा बरकरार है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने CJP और उनके समर्थकों को 'विघटनकारी तत्वों की B-टीम' करार दिया. सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया. विपक्ष भी पूरी तरह एकजुट नहीं था. कांग्रेस नेता पवन खेड़ा तो आए, लेकिन राहुल गांधी नहीं आए. CPI(M) ने समर्थन किया, लेकिन यह काफी नहीं था.

चौथा अंतर: लीडरशिप- 'अनुभवी टीम' बनाम 'अकेला योद्धा'

अन्ना के साथ किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव जैसे चेहरे थे. ये वे लोग थे, जिन्हें जनता जानती थी और जिन पर भरोसा था. आंदोलन में लीडरशिप की एक टीम थी.

सोनम अकेले हैं. CJP एक नया, व्यंग्यात्मक आंदोलन है, जो मई 2026 में पेपर लीक के खिलाफ ऑनलाइन शुरू हुआ. इसके संस्थापक अभिजीत दीपके जनता के लिए अनजान चेहरे हैं. जब सोनम को अस्पताल ले जाया गया, तो अभिजीत दीपके ने भी अनशन शुरू कर दिया, लेकिन उनकी भी वही पहचान है- एक अनजान चेहरा. सोनम की पत्नी गीतांजलि ने संसद मार्च का नेतृत्व करने की कोशिश की, लेकिन दिल्ली पुलिस ने इसे 'अवैध प्रदर्शन' करार देते हुए इजाजत नहीं दी.

पांचवां अंतर: मुद्दे का 'फीका' पड़ना

सोनम के 20 दिन के उपवास के बाद सबसे बड़ी चर्चा यह नहीं रही कि 'शिक्षा मंत्री को क्यों हटना चाहिए', बल्कि यह कि 'सोनम की सेहत कैसी है?'

सोनम 'गर्मी की तपिश में, सिर्फ नमक और पानी' पर 20 दिन तक रहे. डॉक्टरों ने बताया कि वे 'डिहाइड्रेशन' के शिकार हैं, न तो ओरल रिहाइड्रेशन फ्लूइड, न इलेक्ट्रोलाइट सॉल्यूशन, न ही IV थेरेपी' ले रहे हैं. सफदरजंग अस्पताल ने 24/7 निगरानी रखी. केंद्र सरकार ने AIIMS के विशेषज्ञों को भी भेजा.

सोनम की पत्नी ने पोटैशियम टेस्ट के नतीजों पर सवाल उठाए, लेकिन NEET पेपर लीक मुद्दा पीछे रह गया. जनता का ध्यान सोनम की सेहत पर केंद्रित हो गया, न कि उनकी मांग पर.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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