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EXCLUSIVE: छत्तीसगढ़ के गठन के 22 साल बाद नक्सल प्रभावित बस्तर में हुआ कितना विकास, जानें ताजा हाल

छत्तीसगढ़ के गठन के बाद प्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों ने राज किया, लेकिन 22 साल बाद भी बस्तर नक्सल मुक्त नहीं हो पाया है. लोग आज भी यहां मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं.

Bastar News: मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) राज्य गठन को 22 साल पूरे होने वाले हैं. आगामी 1 नवंबर को 22 साल पूरे होने पर राज्योत्सव मनाया जाएगा. इन 22 सालों में छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) में काफी कुछ बदला लेकिन आज भी बस्तर संभाग नक्सल (Naxal) मुक्त नहीं हो पाया है, पिछले 4 दशकों से बस्तर के लोग नक्सलवाद (Naxalism) का दंश झेल रहे हैं, नक्सलवाद की वजह से संभाग के ऐसे कई सुदूर अंचल हैं जहां आज तक सरकार के विकास कार्य नहीं पहुंच पाए हैं.

खासकर अबूझमाड़ का इलाका आज भी विकास से पूरी तरह से अछूता है और यहां के लोग आजादी के 75 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं, हालांकि बस्तर के अन्य इलाकों में पिछले सालों की तुलना में काफी हद तक नक्सलवाद बैकफुट पर आया है और इसके चलते सड़क, बिजली, पानी और मूलभूत सुविधाएं ग्रामीणों तक पहुंची है और दहशत की वजह से नक्सलियों का साथ देने वाले ग्रामीणों ने भी एक स्वर में नक्सलवाद का विरोध कर अपने गांव तक विकास पहुंचने में प्रशासन की भरपूर मदद की है. इन 22 सालों में बस्तर संभाग के कई जिलों की तस्वीर तो बदली लेकिन आज भी बस्तर में नक्सलभय बरकरार है, जिसकी वजह से यहां के सैकड़ों गांव आज भी विकास से अछूते हैं.

नक्सलियों ने ली कई जवानों और आम नागरिकों की जान

छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग काफी पिछड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता है. ऐसे में प्रदेश में जिस भी पार्टी की सरकार बनती है वह सरकार बस्तर संभाग में करोड़ों रुपए खर्च कर गांव-गांव तक विकास पहुंचाने का दावा करती है. बीजेपी शासनकाल में शहरी विकास के साथ ग्रामीण इलाकों में भी स्ट्रक्चर निर्माण को लेकर सरकार ने काफी फोकस किया और सड़क, बिजली, पानी की सुविधाएं गांव तक पहुंचाईं, हालांकि बीजेपी शासन काल के 15 साल के कार्यकाल में कुछ गांवों तक विकास तो पहुंचा लेकिन नक्सलवाद पूरी तरह से हावी रहा और इन विकास कार्यों को पहुंचाने के दौरान कई बड़ी घटनाओं को नक्सलियों ने अंजाम दिया, जिसमें आम जनों के साथ बड़ी संख्या में जवानों की शहादत हुई.

सरकारें आई गईं मगर नक्सलवाद रहा बरकरार

इनमें से प्रमुख जगदलपुर से तेलंगाना को जोड़ने वाली सुकमा कोंटा का नेशनल हाईवे है. इस सड़क के निर्माण कार्य में न जाने कितने जवानों ने अपना बलिदान दिया, लेकिन इस सड़क के बनने के बाद बस्तर की काफी तस्वीर बदली और इन क्षेत्र के गांवों तक एक के बाद एक 50 से अधिक सड़कें बनाई गईं. इन सड़कों के माध्यम से गांव-गांव तक विकास पहुंचाया गया, हालांकि कुछ ग्रामीणों को अब गांव-गांव में बेहतर शिक्षा मिलने के साथ मूलभूत सुविधाएं और मुफ्त राशन का भी लाभ मिल रहा है.

साथ ही कई ऐसे गांव हैं जहां तक बिजली विभाग ने कड़ी मशक्कत के बाद इन गांवों तक रोशनी पहुंचाई है, लेकिन इन गांव में आज भी नक्सलियों की मौजूदगी है जिस वजह से ग्रामीणों के साथ पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों में भी डर का माहौल बना हुआ रहता है, क्योंकि नक्सली इन इलाकों में जवानों और प्रशासन के अधिकारियों को नुकसान पहुंचाने के लिए हमेशा ताक में होते हैं.

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने राज किया. बस्तर में विकास के बड़े-बड़े दावे किए.  दोनों सरकारों ने अपने कुछ वायदे तो पूरे किए लेकिन आज भी बस्तर वासियों के लिए सबसे जरूरी स्वास्थ्य सुविधा 100 से अधिक पंचायतों में नहीं पहुंच सकी है और इन इलाकों के ग्रामीण इलाज के अभाव में मौत के मुंह में समा रहे हैं.

अबूझमाड़ का इलाका  विकास के पहुंच से कोसों दूर है, इस इलाके में ना ही स्वास्थ्य केंद्र हैं और ना ही किसी तरह की स्वास्थ सुविधा का लाभ ग्रामीणों को मिल पाता है, जिस वजह से इन इलाके में रहने वाले सैकड़ों ग्रामीणों की इलाज के अभाव में मौत हो चुकी है. खुद प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंह  देव ने भी यह माना है कि बस्तर संभाग की ऐसे कई पंचायत हैं जहां आज तक स्वास्थ्य विभाग नहीं पहुंच सका है और ना ही साधन पहुंचे हैं, जिस वजह से यहां के ग्रामीण झाड़ फूंक और देसी दवाइयों के भरोसे जिंदगी जी रहे है. एंबुलेंस से लेकर छोटी-छोटी सुविधाएं भी इन गांव तक नहीं पहुंचने से ग्रामीणों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन सरकार इसके लिए गंभीर जरूर है और इन इलाकों में किसी भी तरह से स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाया जाएं इसके प्रयास में पूरी तरह से जुटी हुई है.

आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे बस्तरवासी

वहीं बस्तर के आदिवासी प्रमुखों का कहना है कि छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है और यहां के ग्रामीणों की आय का जरिया जंगलों से मिलने वाली वनोपज है. 22 सालों में सत्ता में आई दोनों दलों की सरकार को छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से जिस तरह से इन इलाकों में विकास पहुंचाना था वह आज तक नहीं पहुंच पाई हैं, जिस वजह से ग्रामीणों के जीवन में सुधार नहीं आ सका है और आज भी सुविधाओं के अभाव में  जूझ रहे हैं.

उन्होंने कहा कि इन गांवों तक सबसे जरूरी सड़क, बिजली, पानी तक नहीं पहुंच पाया है, दोनों ही राजनीतिक दलों के नेता सत्ता में आने के बाद जरूर बस्तर की तस्वीर बदलने के दावे करते हैं लेकर जमीनी स्तर पर जो काम होना चाहिए वह आज तक नहीं हो पाया है, हालांकि इसके पीछे नक्सलवाद भी एक वजह है, लेकिन सरकारों की उदासीनता के चलते जिस गति से इन क्षेत्र में विकास होना चाहिए वो आज तक नहीं हो पाया है.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के गठन के 22 साल पूरे हो चुके हैं लेकिन बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों के आदिवासी शहरी दुनिया से पूरी तरह से अंजान हैं, हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में इसी साल पुलिस प्रशासन के अथक प्रयास से 500 से ज्यादा बंद स्कूलों को दोबारा शुरू किया गया है.

साथ ही नक्सल प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में 200 से अधिक नई सड़कों पर पुल का निर्माण किया गया है और 150 से अधिक गांव तक मोबाइल नेटवर्क पहुंचाया गया है, ऐसे में कहा जा सकता है कि बस्तर संभाग का विकास अभी भी 30% अछूता है  और 70% से भी कम केंद्र औऱ राज्य सरकार की योजनाएं इन सुदूर गांवों तक पहुंच पाई हैं.

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