बिहार में बाढ़ का जिम्मेदार फरक्का बैराज? दुर्गा पूजा में पंडाल के जरिए उठा मुद्दा
पटना में दुर्गा पूजा पर 55 फीट का फरक्का बैराज थीम वाला पंडाल बनेगा. समिति गंगा में गाद, बिहार की बाढ़ और कटाव का मुद्दा उठाकर फरक्का संधि की समीक्षा की मांग करेगी.

राजधानी पटना में इस बार दुर्गा पूजा के दौरान फरक्का बैराज का मुद्दा पंडाल के जरिए उठाया जाएगा. बोरिंग रोड की जमुना गली स्थित कस्तूरबा पथ के शिव मंदिर परिसर में श्री श्री सर्वजन दुर्गा पूजा समिति भारत-बांग्लादेश सीमा के पास स्थित फरक्का बैराज की प्रतिकृति तैयार कर रही है. समिति का दावा है कि फरक्का समझौते के कारण बिहार में गाद जमने, बाढ़ और नदी कटाव की समस्या बढ़ी है. पंडाल के माध्यम से केंद्र सरकार से बिहार के हितों को ध्यान में रखकर इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की मांग की जाएगी.
समिति के अध्यक्ष कुमार पंकज के नेतृत्व में वर्ष 2017 से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है. इस बार समिति अपने आयोजन के दस वर्ष पूरे होने पर फरक्का बैराज को थीम बना रही है. पंडाल की ऊंचाई और चौड़ाई 55-55 फीट होगी. समिति के मुताबिक, पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना के पराक्रम को सम्मान देने के लिए गौरी शंकर मंदिर की थीम पर पंडाल बनाया गया था.
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फरक्का समझौते पर क्यों उठ रहे सवाल?
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर बना है. इसका उद्देश्य हुगली नदी में पानी का प्रवाह बढ़ाकर कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता बनाए रखने में मदद करना है. भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को 30 साल की संधि हुई थी. इस संधि के तहत फरक्का में उपलब्ध पानी का बंटवारा तय किया गया.
बिहार में गाद, बाढ़ और कटाव का मुद्दा
समिति का कहना है कि फरक्का से जुड़ी जल प्रबंधन व्यवस्था और गंगा में गाद जमा होने की समस्या पर बिहार के हितों के लिहाज से पुनर्विचार होना चाहिए. उसका आरोप है कि गाद और नदी के बदलते प्रवाह से बाढ़ तथा कटाव की समस्या बढ़ती है और बड़ी आबादी प्रभावित होती है.
सप्तमी से नवमी तक महाप्रसाद
समिति के अनुसार, कलश स्थापना के साथ पूजा शुरू हो गई है. सप्तमी को मूंग दाल का हलवा, अष्टमी को खीर और नवमी को खिचड़ी का महाप्रसाद बांटा जाएगा. नवमी पर कन्या पूजन और मां दुर्गा को 56 भोग अर्पित करने का कार्यक्रम भी रखा गया है. समिति के मुताबिक, इस वर्ष मां दुर्गा का आगमन हाथी पर और विदाई मुर्गे पर होने की मान्यता है.
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