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8 साल में 7 यूटर्न, पलटी मारने में नीतीश को भी पीछे छोड़ा; विपक्षी एकता का काम बिगाड़ेंगे जीतन राम मांझी?

बिहार की सियासत में पलटी मारने में जीतन राम मांझी नीतीश कुमार से आगे हैं. 8 साल में मांझी 7 बार यूटर्न ले चुके हैं, जबकि नीतीश 10 साल में 4 बार. मांझी के एग्जिट से कितनी बदलेगी बिहार की सियासत?

गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के 60 दिन बाद बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार को बड़ा झटका दिया है. मांझी के बेटे संतोष सुमन ने मंगलवार को नीतीश कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. मांझी के बीजेपी के साथ जाने की अटकलें लगाई जा रही है. 

2014 में नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को जेडीयू से मुख्यमंत्री बनाया था, लेकिन कुछ महीने बाद ही मांझी ने नीतीश के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया. 2015 में मांझी ने हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (सेक्युलर) नाम से खुद की पार्टी बनाई.

बिहार की सियासत में पल्टी मारने में मांझी नीतीश कुमार से आगे हैं. 8 साल में मांझी 7 बार यूटर्न ले चुके हैं. कांग्रेस से राजनतिक करियर की शुरुआत करने वाले जीतन राम मांझी और उनकी पार्टी के बारे में इस स्टोरी में विस्तार से जानते हैं...

नीतीश की नाव से क्यों कूदे मांझी?
बिहार की सियासत में सबसे बड़ा सवाल अभी यही पूछा जा रहा है कि खुद को मुख्यमंत्री और बेटे को मंत्री बनाने वाले नीतीश कुमार से मांझी ने क्यों बगावत की? 


8 साल में 7 यूटर्न, पलटी मारने में नीतीश को भी पीछे छोड़ा; विपक्षी एकता का काम बिगाड़ेंगे जीतन राम मांझी?

1. जेडीयू में विलय का दबाव था- जीतन राम मांझी की पार्टी हम (से) जेडीयू से अलग होकर बनी थी. नीतीश कुमार विपक्षी एकता में जुटे हैं और छोटी-छोटी पार्टियों को एकसाथ मर्ज करने की कवायद कर रहे हैं.

इसी कड़ी में नीतीश कुमार मांझी से अपनी पार्टी का जेडीयू में विलय करने का दबाव बना रहे थे. विलय के पीछे जेडीयू सीट बंटवारे का तर्क दे रही थी. जेडीयू का कहना था कि हर छोटी पार्टियों को लोकसभा में सीट देना संभव नहीं है.

संतोष सुमन ने इस्तीफा देने के बाद विलय का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि महागठबंधन में सर्वाइव करना मुश्किल हो रहा था. संतोष के इस्तीफे के बाद जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह ने भी विलय करने की बात कही.

2.  हम की जीती हुई सीट आरजेडी का गढ़- जीतन राम मांझी की पार्टी हम (से) 2020 के विधानसभा चुनाव में गया-जमुई की चार सीटों पर जीत मिली थी. खुद मांझी इमामगंज से, ज्योति देवी बाराचट्टी से, अनिल कुमार टिकारी से और प्रफुल मांझी सिकंदरा से जीत दर्ज की थी.

यह चारों सीट राजद का मजबूत गढ़ रहा है. 2025 में राजद इनमें से 2 सीट बाराचट्टी और टिकारी पर दावा ठोक सकता है. मांझी ये बात भी बखूबी से जानते हैं, इसलिए इन सीटों को लेकर आश्वासन चाह रहे थे. 

मंगलवार (13 जून) को जब विजय चौधरी से बात नहीं बनी तो मांझी ने बेटे को बुलाकर इस्तीफा दिलवा दिया. 

3. सत्ता भागीदारी की महत्वाकांक्षा अधिक- जीतन राम मांझी गठबंधन में सहयोगी के नाते सत्ता की भागीदारी चाहते थे. मांझी 2021 से ही खुद के लिए 2 कैबिनेट बर्थ चाहते थे, लेकिन नीतीश कुमार 4 विधायक पर एक मंत्री के फॉर्मूले को आधार बनाकर उनके बेटे को मंत्री बनाया था.

बीजेपी गठबंधन में संतोष सुमन को एससी-एसटी वेलफेयर के अलावा लघु जल संसाधन विभाग भी मिला था, लेकिन आरजेडी गठबंधन में यह उनसे ले लिया गया. मांझी ने उस वक्त भी नीतीश कुमार से विभाग बढ़ाने की मांग की थी.

संतोष सुमन के इस्तीफे के बाद राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने कह कि पद की लालसा में मांझी उतावले हो गए हैं.

8 साल में 7 बार पलटे, नीतीश को पीछे छोड़ा
जीतन राम मांझी पिछले 8 साल में 7 बार यूटर्न ले चुके हैं. जबकि नीतीश कुमार 10 साल में 4 बार. मांझी 2015 में जेडीयू से रिश्ता तोड़ने के बाद खुद की पार्टी बनाई और एनडीए में शामिल हो गए. मांझी 21 सीटों पर चुनाव लड़े, लेकिन सिर्फ खुद की सीट बचा पाए.

2017 में मांझी एनडीए से अलग हो गए और यूपीए में शामिल हो गए. मांझी को 40 में से 3 सीटें मिली, लेकिन एक भी जीत नहीं पाए. इसके बाद नीतीश के सहारे मांझी फिर एनडीए में पहुंच गए. 


8 साल में 7 यूटर्न, पलटी मारने में नीतीश को भी पीछे छोड़ा; विपक्षी एकता का काम बिगाड़ेंगे जीतन राम मांझी?

2020 में हम (से) एनडीए के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरे. मांझी की पार्टी को 7 सीटें मिली, जिसमें से 4 पर जीत दर्ज की. 2022 में जब नीतीश कुमार एनडीए से अलग हुए तो मांझी भी उनके साथ निकल गए.

मांझी महागठबंधन में शामिल हुए और नीतीश के साथ कभी न जाने की कसम भी खाई. 2023 में राजनीतिक फैसला लेते हुए उन्होंने नीतीश कुमार कैबिनेट से खुद की पार्टी को अलग कर लिया है. जेडीयू ने कहा है कि मांझी महागठबंधन से भी अलग हो गए हैं.


8 साल में 7 यूटर्न, पलटी मारने में नीतीश को भी पीछे छोड़ा; विपक्षी एकता का काम बिगाड़ेंगे जीतन राम मांझी?

अमित शाह से मुलाकात ने आग में घी डाला
जीतनराम मांझी 13 अप्रैल को दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह से मिले. मांझी के अलावा इस मुलाकात में पार्टी के दिल्ली अध्यक्ष रजनीश कुमार समेत 4 अन्य नेता भी मौजूद थे. इस मीटिंग के बाद जेडीयू चौंकना हो गई और मांझी पर विलय का दबाव बनाने लगी.

नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता की मीटिंग में भी मांझी को न्यौता नहीं दिया, जबकि गठबंधन के अन्य दलों को आमंत्रण भेजा गया था. सियासी गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि नीतीश कुमार को विपक्षी एकता की मीटिंग से ठीक पहले मांझी के बागी होने की भनक लग गई थी. 

इसी के बाद विजय चौधरी और ललन सिंह को तुरंत फैसला करने के लिए कहा गया था. संतोष सुमन ने अपना इस्तीफा भी चौधरी को ही सौंपा, जिसे बाद में नीतीश कुमार के पास पहुंचाया गया.

बीजेपी के नए समीकरण में फिट, नीतीश को कितना नुकसान?
नीतीश कुमार दोस्ती टूटने के बाद बीजेपी बिहार में 2014 के मॉडल पर आगे बढ़ रही है. बीजेपी के इस नए समीकरण में मांझी पूरी तरह फिट हैं. 2014 में बीजेपी ने राम विलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के साथ मिलकर 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी. 

बीजेपी अब तक चिराग पासवान, पशुपति पारस और उपेंद्र कुशवाहा को साधने में कामयाब हो चुकी है. पार्टी की कोशिश जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी को भी साधने की है. बिहार में मांझी मुसहर जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं. 2015 में उनकी पार्टी को 2 प्रतिशत मत मिले थे.


8 साल में 7 यूटर्न, पलटी मारने में नीतीश को भी पीछे छोड़ा; विपक्षी एकता का काम बिगाड़ेंगे जीतन राम मांझी?

बिहार में मुसहर आबादी करीब 3 प्रतिशत के आसपास है, जो गया, जमुई, जहानाबाद, मधुबनी और दरभंगा की राजनीति को प्रभावित करती है. मंडल वर्सेज कमंडल की राजनीति में बीजेपी जातीय गठजोड़ में भी पीछे नहीं रहना चाहती है. 

2019 में जीतन राम मांझी लोकसभा की 3 सीटों पर चुनाव लड़ चुके हैं. 3 में से 2 सीटों पर जेडीयू को जीत मिली थी. इस बार अगर मांझी मजबूती से लड़ते हैं तो नीतीश कुमार को इसका नुकसान हो सकता है. 

साथ ही मुसहर समुदाय को भी साधने की चुनौती नीतीश कुमार के सामने है. संतोष सुमन के इस्तीफे के बाद जेडीयू से मुसहर समुदाय के रत्नेश सादा को मंत्री बनाए जाने की चर्चा है. इसे डैमेज कंट्रोल के रूप में देखा जा रहा है. 

बयानबाजी कर मुद्दा डायवर्ट करने में भी मांझी माहिर हैं. ऐसे में नीतीश कुमार को चुनावी नुकसान संभव है.

अब मांझी के राजनीतिक किस्से...

विधायक बनने के 3 साल बाद ही मंत्री बने
मांझी 1980 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार फतेहपुर से विधायक बने. 1980 का दौर बिहार की सियासत में उठापटक का दौर था. जग्गनाथ मिश्रा के जाने के बाद कांग्रेस ने चंद्रशेखर सिंह को मुख्यमंत्री बनाया. सिंह ने 1983 में अपने हिसाब से कैबिनेट सेट किया.

इस फेरबदल में मांझी की किस्मत चमक गई. पहली बार विधायक बने मांझी सरकार में मंत्री बनाए गए. 1985 में दोबारा विधायक बनने में कामयाब रहे और बिंदेश्वरी दुबे की सरकार में मंत्री बने.

बुरे वक्त में कांग्रेस-आरजेडी को भी छोड़ा
1990 में मांझी मंत्री रहते हुए गया के फतेहपुर सीट से चुनाव हार गए. चुनाव हारने के बाद मांझी कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में शामिल हो गए. 1996 में जनता दल में टूट हो गई और सरकार में शामिल लालू यादव ने राष्ट्रीय जनता दल का गठन कर लिया. 

मांझी जनता दल छोड़ लालू के साथ आरजेडी में चले गए. 1996 में भागवती देवी के सांसद बनने से बाराचट्टी सीट रिक्त घोषित हुआ और यहां उपचुनाव कराए गए. मांझी को लालू ने बाराचट्टी से टिकट दे दिया. मांझी चुनाव जीतने में सफल रहे.

मांझी लालू और राबड़ी सरकार में मंत्री रहे, लेकिन 2005 में उन्होंने आरजेडी का भी साथ छोड़ दिया. 2005 में नीतीश कुमार ने उन्हें अपने कैबिनेट में शामिल किया.

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