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IN PICS: जिस तिरंगे पर है हर भारतीय को गर्व, जानें उस तिरंगे का इतिहास!

हम 2 दिनों बाद आजादी की 70वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं. 15 अगस्त के दिन प्रत्येक भारतीय तिरंगे को सम्मान देता है. हर सड़क-मकान की छत पर तिंरगा लहराता नजर आता है. हर भारतीय को तिरंगा अपनी जान से भी अधिक प्यारा होता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं तिरंगे के इतिहास के बारे में. आगे की स्लाइड्स में जानें क्या है हमारे तिरंगे का इतिहास!

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  हम 2 दिनों बाद आजादी की 70वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं. 15 अगस्त के दिन प्रत्येक भारतीय तिरंगे को सम्मान देता है. हर सड़क-मकान की छत पर तिंरगा लहराता नजर आता है. हर भारतीय को तिरंगा अपनी जान से भी अधिक प्यारा होता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं तिरंगे के इतिहास के बारे में. आगे की स्लाइड्स में जानें क्या है हमारे तिरंगे का इतिहास!
हम 2 दिनों बाद आजादी की 70वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं. 15 अगस्त के दिन प्रत्येक भारतीय तिरंगे को सम्मान देता है. हर सड़क-मकान की छत पर तिंरगा लहराता नजर आता है. हर भारतीय को तिरंगा अपनी जान से भी अधिक प्यारा होता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं तिरंगे के इतिहास के बारे में. आगे की स्लाइड्स में जानें क्या है हमारे तिरंगे का इतिहास!
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22 जुलाई 1 9 47 को संविधान सभा ने वर्तमान झंडे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया. आजादी मिलने के बाद इस झंडे के रंग और उनका महत्व बना रहा. लेकिन झंडे में चलते हुए चरखे की जगह सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दे दिया गया. इस तरह कांग्रेस पार्टी का तिरंगा स्वतंत्र भारत का तिरंगा बना गया. (Source Wikipedia)
22 जुलाई 1 9 47 को संविधान सभा ने वर्तमान झंडे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया. आजादी मिलने के बाद इस झंडे के रंग और उनका महत्व बना रहा. लेकिन झंडे में चलते हुए चरखे की जगह सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दे दिया गया. इस तरह कांग्रेस पार्टी का तिरंगा स्वतंत्र भारत का तिरंगा बना गया. (Source Wikipedia)
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वर्ष 1931 तिरंगे के इतिहास का एक महत्वपूर्ण वर्ष है. तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय झंडे के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसे राष्ट्र-ध्वज के रूप में मान्यता मिली. यह झंडा केसरिया, सफेद और बीच में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था. यह भी साफ तरह से बताया गया था कि इसका कोई साम्प्रदायिक महत्त्व नहीं होगा.
वर्ष 1931 तिरंगे के इतिहास का एक महत्वपूर्ण वर्ष है. तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय झंडे के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसे राष्ट्र-ध्वज के रूप में मान्यता मिली. यह झंडा केसरिया, सफेद और बीच में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था. यह भी साफ तरह से बताया गया था कि इसका कोई साम्प्रदायिक महत्त्व नहीं होगा.
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1921 में हरे और लाल रंग के झंडे को गैर आधिकारिक ढ़ग से मान्यता दी गई. इस झंडे में हरे और लाल के साथ एक बड़ा सा चरखा भी था. कांग्रेस के सत्र बेजवाड़ा में इसे प्रदर्शित किया गया था. आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वैंकैया ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया. यह दो रंगों का बना था. लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्वं करता था. गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए.
1921 में हरे और लाल रंग के झंडे को गैर आधिकारिक ढ़ग से मान्यता दी गई. इस झंडे में हरे और लाल के साथ एक बड़ा सा चरखा भी था. कांग्रेस के सत्र बेजवाड़ा में इसे प्रदर्शित किया गया था. आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वैंकैया ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया. यह दो रंगों का बना था. लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्वं करता था. गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए.
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तीसरे झंडे को 1917 में मान्यता दी गई. ये झंडा कुछ इस तरह दिखाई देता था. डॉ॰ एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान तीसरे झंडे को फहराया. इस झंडे में  5 लाल और 4 हरी पट्टियां थीं. सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे. ऊपरी किनारे पर बायीं ओर यूनियन जैक था. एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था.
तीसरे झंडे को 1917 में मान्यता दी गई. ये झंडा कुछ इस तरह दिखाई देता था. डॉ॰ एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान तीसरे झंडे को फहराया. इस झंडे में 5 लाल और 4 हरी पट्टियां थीं. सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे. ऊपरी किनारे पर बायीं ओर यूनियन जैक था. एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था.
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1907 में पेरिस में मैडम बीकाजी कामा ने झंडा फहराया था. ये झंडा पहले झंडे से अलग था. इस झंडे में सबसे केसरिया, पीला और हरा रंग था. पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निकाले गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था. कुछ लोगों की मान्यता है कि दूसरा झंडा पहले झंडे जैसा ही था. सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे.
1907 में पेरिस में मैडम बीकाजी कामा ने झंडा फहराया था. ये झंडा पहले झंडे से अलग था. इस झंडे में सबसे केसरिया, पीला और हरा रंग था. पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निकाले गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था. कुछ लोगों की मान्यता है कि दूसरा झंडा पहले झंडे जैसा ही था. सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे.
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7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान चौक में इस झंडे को फहराया गया था. इस झंडे में तीन पट्टियां थीं. जिनका रंग हरा, पीला और लाल था और इस झंडे के बीच में पीली पट्टी पर वन्देमातरम लिखा हुआ था. पहला झंडा 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था. 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक कलकत्ता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था. इस झंडे को लाल, पीले और हरे रंग की पट्टियों से बनाया गया था. ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए थे. बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम लिखा गया था.
7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान चौक में इस झंडे को फहराया गया था. इस झंडे में तीन पट्टियां थीं. जिनका रंग हरा, पीला और लाल था और इस झंडे के बीच में पीली पट्टी पर वन्देमातरम लिखा हुआ था. पहला झंडा 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था. 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक कलकत्ता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था. इस झंडे को लाल, पीले और हरे रंग की पट्टियों से बनाया गया था. ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए थे. बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम लिखा गया था.

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