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इजरायल-हमास युद्ध ने कैसे चीन की उम्मीदों पर फेरा पानी? मिडिल ईस्ट में ड्रैगन को लगा झटका

Israel Gaza Attack: 7 अक्टूबर को इजरायल पर हमास के हमलों के बाद गाजा में शुरू हुई जंग अब चीन की महत्वाकांक्षाओं के लिए चुनौती बन रही है.

Israel Hamas War: इजरायल-हमास के बीच युद्ध जारी है. इसके लेकर पूरी दुनिया दो खेमों में बंटती नजर आ रही है. मध्य पूर्व में अपने हित रखने वाली महाशक्तियों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है. विशेष कर चीन पर. दरअसल, चीन ने इस साल की शुरुआत में ईरान और सऊदी अरब के बीच चली आ रही सात साल की राजनयिक दरार को खत्म कर दोनों देशों की बीच सामान्य संबंधों स्थापित करने में मदद की.

ईरान और सऊदी अरब के बीच मध्यस्थle करवाने के बाद चीन को आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद थी. अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने अपने हितों के मद्देनजर इजरायल और फिलिस्तीन के बीच मध्यस्थता कराने की भी पेशकश की और मई महीने में फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मेजबानी की.

चीन की उम्मीदों पर पानी फेरा
विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा लग रहा था कि चीन मध्यपूर्व में अमेरिका की जगह ले सकता है. हालांकि, इजरायल-हमास युद्ध ने उसकी उम्मीदों पर पानी भेर दिया है और 7 अक्टूबर को इजरायल पर हमास के हमलों के बाद गाजा पर इजरायल की कार्रवाई चीन की महत्वाकांक्षाओं के लिए चुनौती बन रही है.

अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, विश्लेषकों के मुताबिक संघर्ष के दोनों पक्षों में बीजिंग के हित हैं. चीन ने लंबे समय से टू-स्टेट सोल्यूशन की वकालत की है और 1960 और 1970 के दशक में फिलिस्तीनी लिब्रेशन ओर्गानइजेशन को सशस्त्र किया. वहीं, दूसरी तरफ बीजिंग इजरायल का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है.

इससे पहले शुक्रवार (27 अक्टूबर)  को चीन ने संघर्ष विराम के आह्वान करने वाले गैर-बाध्यकारी संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया.

इजरायल-हमास युद्ध पर चीन ने क्या कहा?
युद्ध शुरू होने के बाद से चीन ने का रुख मध्यस्थता का रहा है और संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता रहा है. हमास के हमले के बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने संबंधित पक्षों को शांत रहने, संयम बरतने और नागरिकों की रक्षा के लिए दुश्मनी को खत्म करने की अपील की.

चीन मध्यस्थ क्यों बना हुआ है?
अब सवाल यह है कि आखिर चीन युद्ध को लेकर मध्यस्थ क्यों बना हुआ है. दरअसल, इस स्थिति में किसी का पक्ष न लेना उसके दीर्घकालिक क्षेत्रीय हित में है. इसके अलावा यह एक ऐसा मामला जहां ईरान और सऊदी अरब दोनों एक समाधान चाहते हैं. इसके अलावा चीन किसी ऐसे मामले में पड़ना नहीं चाहता, जहां अन्य ताकतों के हित भी हों.

चीन के क्या हित है?
इस क्षेत्र में चीन के मजबूत आर्थिक हित हैं और अगर मौजूदा युद्ध में अन्य खिलाड़ी शामिल होते हैं तो वे इससे प्रभावित होंगे. चीन सऊदी अरब, इराक और ईरान से पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा आयात करता है. 2021 में चीन ने मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के साथ 259 अरब डॉलर का कारोबार किया था जो इस क्षेत्र में अमेरिकी व्यापार की मात्रा का तीन गुना ज्यादा है. वहीं, 2021 में ही चीन ने इजरायल के साथ 18 बिलियन डॉलर का कारोबार किया था.

यह भी पढ़ें- क्या जल्द खत्म हो जाएगा इजरायल-हमास युद्ध? ये छोटा सा देश मिडिल ईस्ट में शांति के लिए करवा रहा मध्यस्थता

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