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महाविनाश के कगार पर पहुंची दुनिया, परमाणु वैज्ञानिकों ने एक बार फिर प्रलय की घड़ी को किया सेट

Doomsday Clock : बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट के मुताबिक, यह घड़ी आधी रात को उस क्षण के बारे में बताती है जब पृथ्वी इंसानों के रहने लायक नहीं होगी और हर तरह महाविनाश छा जाएगा.

Scientists set the Doomsday Clock : परमाणु वैज्ञानिकों ने एक बार फिर से प्रलय की घड़ी को सेट किया है. मंगलवार (28 जनवरी) को परमाणु वैज्ञानिकों ने इस घड़ी को सेट करके आधी रात से 89 सेकेंड पहले कर दिया है. दरअसल, परमाणु वैज्ञानिकों 78 साल पहले एक अनोखी घड़ी बनाई थी, जिसे डूम्सडे क्लॉक (प्रलय की घड़ी) नाम दिया गया था. यह घड़ी इस बात का एक प्रतिकात्मक प्रयास था कि इंसान दुनिया को नष्ट करने के कितने नजदीक है,

बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट के मुताबिक, यह घड़ी आधी रात को उस क्षण के बारे में बताती है जब पृथ्वी इंसानों के रहने लायक नहीं होगी और हर तरह महाविनाश छा जाएगा. इससे पहले दो सालों के लिए बुलेटिन ने यूक्रेन पर रूसी हमले, परमाणु हथियारों की दौड़ की संभावना, गाजा में इजरायल-हमास युद्ध और जलवायु संकट के कारण घड़ी को आधी रात से 90 सेकेंड पहले सेट किया था. इस तरह से देखा जाए तो वैज्ञानिकों ने इसे पिछली बार से 1 सेकेंड पहले सेट किया है.

1947 में बनाई गई थी प्रलय की घड़ी

अमेरिका के एक राज्य शिकागो में स्थित गैर-लाभकारी संस्था बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स ने 78 साल पहले साल 1947 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शीत युद्ध के तनाव के दौरान इस घड़ी को बनाया था, ताकि इसके माध्यम से लोगों को यह चेतावनी दी जा सके कि इंसान दुनिया के नष्ट करने के कितनी करीब थी.

बुलेटिन के विज्ञान और सुरक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डैनियल होल्ज ने मंगलवार (28 जनवरी) को कहा, ‘हमने घड़ी को आधी रात के करीब सेट किया है क्योंकि हम परमाणु जोखिम, जलवायु परिवर्तन, जैविक खतरों और एआई जैसी विघटनकारी प्रोद्यौगिकियों में प्रगति सहित वैश्विक चुनौतियों पर पर्याप्त और सकारात्मक प्रगति नहीं देखते हैं.’

उन्होंने कहा, “जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, वे अपने शस्त्रागार के आकार और भूमिका को बढ़ा रहे हैं. ऐसे हथियारों में सैकड़ों अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं जो किसी भी सभ्यता को कई बार नष्ट कर सकते हैं.”

क्या है प्रलय की घड़ी?

उल्लेखनीय है कि बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स की स्थापना वैज्ञानिकों के एक समूह ने की थी. जिन्होंने मैनहट्टन प्रोजेक्ट पर भी काम किया था. मैनहट्टन प्रोजेक्ट द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम के विकास के लिए बनाया गया था. वास्तविक रूप से संगठन की कल्पना परमाणु खतरों को मापने के लिए की गई थी. लेकिन, 2007 में इसने अपनी गणना में जलवायु परिवर्तन को भी शामिल करने का फैसला किया था.

इस बोर्ड को पहली बार दिसंबर 1948 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने स्थापित किया था और इसके पहले अध्यक्ष जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर थे. वहीं, वर्तमान में इस बोर्ड में 9 नोबेल पुरस्कार विजेता शामिल हैं.

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