खेत में खुदाई के दौरान निकली देवी की प्राचीन मूर्ति, 1000 साल पुरानी होने का दावा
मुजफ्फरनगर जिले के बाढ़ गांव में एक खेत की खुदाई के दौरान पत्थर से निर्मित देवी की मूर्ति मिली है. इस मूर्ति के पास ही मृदभांड भी मिले है. खेत से देवी की मूर्ति मिलने के बाद पूरे गांव के लोग उसे देखने के लिए खेत में इकठ्ठा हो गये.

मुजफ्फरनगर: जिले के बाढ़ गांव में एक खेत की खुदाई के दौरान पत्थर से निर्मित देवी की मूर्ति मिली है. इस मूर्ति के पास ही मृदभांड भी मिले है. खेत से देवी की मूर्ति मिलने के बाद पूरे गांव के लोग उसे देखने के लिए खेत में इकठ्ठा हो गये और मूर्ति लेने की कोशिश करने लगे. पुलिस ने खुदाई में मिला सामान कब्जे में लेकर सील कर दिया है.
31 जनवरी की दोपहर बाढ़ गांव के पिंकेश तेजपाल के खेत में मिट्टी की खुदाई कर रहा था. उसे खेत की मिट्टी ट्रैक्टर-ट्राली में भरकर पास के गांव ले जानी थी. इसी दौरान खेत में उसे मिट्टी की एक मूर्ति मिली. करीब दस इंच ऊंची और 5 से 6 इंच चौड़ी यह प्रतिमा पत्थर की बनी हुई है. मूर्ति में देवी महिषासुरमर्दिनी रूप में दिख रही हैं.
गुलाबी पत्थर की इस मूर्ति के साथ कई प्राचीन काल के कई बर्तन (मृदभांड) भी खेत में दबे हुए मिले है. इन प्राचीन वस्तुओं को मिलने की जानकारी जब ग्रामीणों को हुई तो खेत पर खासतौर से इस मूर्ति को देखने के लिए हजारों लोग इकठ्ठा हो गये. ग्रामीण इस मू्र्ति को खेत में ही मंदिर बनाकर प्रतिष्ठित करने की मांग कर रहे थे.
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भीड़ जुटने पर इसकी सूचना थाना चरथावल पुलिस को दी गई. मौके पर पुलिस बल के साथ पहुंचे बिरालसी चौकी प्रभारी ब्रह्मजीत ने प्राचीन वस्तुओं को अपने कब्जे में ले लिया और ग्रामीणों को समझाबुझा कर मौके से हटाया. बाद में थाना प्रभारी भी मौके पर पहुंच गये.
थाना प्रभारी चरथावल संतोष कुमार त्यागी ने बताया कि पौराणिक वस्तुओं को लोग अपने हिसाब से इस्तेमाल करने के लिए हंगामा कर रहे थे लेकिन यह भारतीय पुरातत्व विभाग की सम्पत्ति है. सभी वस्तुओं को को कब्जे में लेकर सील कर दिया गया है और पुरातत्व विभाग को सूचना दी गई है. आगे का निस्तारण पुरातत्व विभाग को ही करना है.
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पुरातत्वविद डॉ अमित पाठक ने बताया कि मुजफ्फरनगर में खुदाई के दौरान जो मूर्ति मिली है उसकी तस्वीर उन्होंने देखी है. यह मूर्ति महिषासुरमर्दिनी की है जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में 800 साल पहले निर्मित होना बंद हो गई थी. मगर यह चलन पश्चिम बंगाल और उससे जुड़े राज्यों में अभी भी जारी है. यह मूर्ति करीब 1000 साल पुरानी हो सकती है. जो मृदभांड मिले हैं उनकी भी उम्र करीब इतनी ही रही होगी.
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