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सिरोही: श्रवण कुमार के कंधों का 'भार' उतरा तो पड़ा नाम भारजा, जानें इस प्राचीन गांव का इतिहास

Sirohi News in Hindi: भारजा गांव अरावली की तलहटी में स्थित प्राचीन गांव है. जहां महल, बावड़ियां, मंदिर, शिलालेख और वीर स्मारक इसके गौरवशाली इतिहास व सांस्कृतिक धरोहर की गवाही देते हैं.

सिरोही जिले की पिंडवाड़ा तहसील से आबूरोड जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के बाईं ओर अरावली पर्वतमाला की तलहटी में स्थित प्राचीन भारजा गांव अपने गौरवशाली इतिहास, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक धरोहरों के कारण विशेष पहचान रखता है. यह गांव प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक महत्व का केंद्र रहा है. जहां आज भी महल, मंदिर, बावड़ियां, छतरियां और शिलालेख बीते समय की समृद्ध परंपरा की साक्षी बने हुए हैं.

इतिहासकार डॉ. उदयसिंह डिगार के अनुसार प्राचीन शिलालेखों में इस गांव का नाम 'भाहरजा' भी मिलता है. स्थानीय जनश्रुति के अनुसार मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कंधों पर बैठाकर तीर्थयात्रा कराते हुए इस क्षेत्र से गुजरे थे. बताया जाता है कि इसी स्थान पर उन्होंने अपने कंधों का भार उतारा था. इसी घटना से इस स्थान का नाम 'भाहरजा' पड़ गया, जो आज भी लोगों की आस्था और परंपरा में जीवित है.

सिरोही रियासत से मिला भारजा का संबंध

इतिहास में भारजा का संबंध सिरोही रियासत से भी रहा है. उल्लेख मिलता है कि सिरोही स्टेट के शासक महाराव मानसिंह तृतीय के छोटे भाई जगत सिंह को भारजा की जागीर प्रदान की गई थी. बाद में जब सिरोही के शासक महाराव तखतसिंह का निसंतान निधन हो गया तो सन 1781-1782 ईस्वी के दौरान भारजा के जागीरदार जगत सिंह को सिरोही स्टेट की राजगद्दी मिली और वे राज्य के शासक बने. यह घटना भारजा ग्राम के ऐतिहासिक महत्व को और अधिक बढ़ाती है.

इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि यह ग्राम कभी देवड़ा बद सिंह की जागीर में भी रहा. उनके देवलोक गमन के बाद पादरू कुआं दान में दिया गया था. उनके निसंतान निधन के पश्चात सिरोही रियासत के शासक महाराव वेरीसाल द्वितीय (1782-1809 ई.) के राजकुमार अखेराव को पुनः भारजा की जागीर प्रदान की गई थी.

प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में गिनी जाती है कलात्मक बावड़ी

गांव में पहाड़ी पर स्थित प्राचीन महल आज भी उस समय की भव्यता का परिचय देते हैं. वहीं रानी रतन कंवर द्वारा बनवाई गई विशाल और कलात्मक बावड़ी 'रतनवाव' यहां की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में गिनी जाती है. प्राचीन अभिलेखों में भारजा के महलों, मंदिरों, वीरों की छतरियों, जुझारों के स्मारकों और बावड़ियों का उल्लेख मिलता है, जो इस क्षेत्र के समृद्ध अतीत की झलक प्रस्तुत करते हैं.

गांव में स्थित राजावाड़ा कुएं पर सन 1672 ईस्वी का शिलालेख आज भी देखा जा सकता है. इसके अलावा सावलाजी मंदिर में सन 1799 ईस्वी का शिलालेख भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण माना जाता है. बुकेश्वर महादेव मंदिर परिसर में जागीरदार महाराज अखेराव जी की सुंदर छतरी भी बनी हुई है, जिसे उनकी रानी जोधीजी ने सन 1829 ईस्वी में बनवाया था.

इतिहासकारों के अनुसार लगभग सन 1570 ईस्वी के आसपास चीबावत देवड़ा खेत सिंह को सिरोही स्टेट की ओर से इस क्षेत्र में भूमि प्रदान की गई थी. उनके वंश में उदय सिंह चीबावत देवड़ा ने सन 1828 ईस्वी में गायों की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की थी. उनकी स्मृति में यहां छतरी आज भी मौजूद है. इसी वंश के एक अन्य वीर का उल्लेख सन 1835 ईस्वी में जुझार होने के रूप में मिलता है.

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भारजा गांव में जैन धर्म की भी देखने को मिलती है प्राचीन उपस्थिति

भारजा गांव में जैन धर्म की भी प्राचीन उपस्थिति देखने को मिलती है. यहां के जैन मंदिर में संवत 1630 की प्राचीन प्रतिमा आज भी विराजमान है. इसके अलावा लगभग तीन सौ वर्ष पुराना महल और रतनबावड़ी यहां की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहर मानी जाती है, जो इस क्षेत्र की स्थापत्य कला और सांस्कृतिक वैभव को दर्शाती है.

इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि कच्छ के शासक महाराजा खंगारजी सन 1909 में भारजा आए थे, जो इस गांव की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा को दर्शाता है. इतिहासकार डॉ. डिगार बताते हैं कि प्राचीन समय में यह गांव बुकेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थित था, जो कालांतर में वर्तमान स्थान पर बसाया गया. गांव के अमरसिंह देवड़ा और सवाराम देवासी के अनुसार भारजा में सूर्यमंदिर, सावलाजी मंदिर, बुकेश्वर महादेव मंदिर, माजीसा धाम, गोगाजी मंदिर, सिकोतर माता, कागऋषि मंदिर, खेतलाजी, गणपति मंदिर, अंबेमाता, सोदरा माता, कालिका माता, शीतला माता, जैन मंदिर, आशापुरा माता, रामदेवजी सिंह माता और जागनाथजी सहित दर्जनों प्राचीन मंदिर स्थित हैं. इसके अलावा अनेक वीरों की छतरियां, स्मारक और शिलालेख भी यहां मौजूद हैं, जो इस प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी के गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं.

सिरोही रियासत के प्रसिद्ध और पराक्रमी राजपूत योद्धा थे चीबावत देवड़ा चौहान

इतिहासकारों के अनुसार चीबावत देवड़ा चौहान सिरोही रियासत के प्रसिद्ध और पराक्रमी राजपूत योद्धा थे. उन्होंने जागीर की रक्षा और राज्य की सेवा में अनेक युद्धों में भाग लिया. इतिहास में चिबा संग्रामसिंह को महाराव लुंबाजी द्वारा आबू पर अधिकार के बाद सन 1308 में कोरटा पट्टे में 42 गांव की जागीर देने का उल्लेख मिलता है. बाद में चिबा राजसिंह और उनके पुत्र भीमसिंह को 24 गांव की जागीर प्रदान की गई. इसी प्रकार चिबा रायधरसिंह ने सन 1438 में सारणेश्वरजी के समीप राव सहस्तमल और राणा कुम्भा के समय हुए युद्ध में वीरगति प्राप्त की. चिबा खेमराजसिंह भी महाराव सुरतानसिंह के काल में युद्ध करते हुए काम आए थे.

कहा जाता है कि जब चिबा खेत सिंह की ओर से बुआड़ा की जागीर छूट गई, तब उनके वंशजों ने आकर भारजा को आबाद किया और यहां अपनी नई बसावट की. आज भी उनके वंशजों और वीरों की स्मृतियां इस गांव की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा बनी हुई हैं. अरावली की गोद में बसा भारजा ग्राम अपने प्राचीन महलों, बावड़ियों, मंदिरों, शिलालेखों और वीर स्मारकों के कारण इतिहास, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम माना जाता है. यह गांव सिरोही जिले की प्राचीन धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी सुनाता है.

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